विशेष लग्न — भाव, होरा और घटी लग्न कैसे निकालें (बृहत्पाराशर होराशास्त्र अध्याय 5)
संक्षेप में
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (5.1–8) में तीन विशेष लग्न हैं, जो सूर्योदय के समय सूर्य की राशि से शुरू होते हैं — भाव लग्न हर 5 घटी (2 घंटे) में, होरा लग्न हर 2.5 घटी (1 घंटा) में, और घटी लग्न हर 1 घटी (24 मिनट) में एक राशि आगे बढ़ता है। परंपरा में होरा लग्न से धन और घटी लग्न से पद-अधिकार का विचार होता है। "श्री लग्न" का नाम इस अध्याय में नहीं मिलता।
विशेष लग्न क्या हैं?
जन्म लग्न वह राशि है जो जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर उदित हो रही थी। इसके अलावा पराशर ने विशेषलग्नाध्याय (5) में तीन और लग्न बताए हैं, जो सूर्योदय से बीते समय पर आधारित हैं:
अथाहं सम्प्रवक्ष्यामि तवाग्रे द्विजसत्तम ।
भावहोराघटीसञ्ज्ञलग्नानीति पृथक् पृथक् ॥ १॥अर्थ: अब मैं भाव, होरा और घटी नाम के लग्न अलग-अलग बताता हूँ।
भाव लग्न
सूर्योदयं समारभ्य घटिकानां तु पञ्चकम् ।
प्रयाति जन्मपर्यन्तं भावलग्नं तदेव हि ॥ २॥इष्टं घट्यादिकं भक्त्वा पञ्चभिर्भादिकं फलम् ।
योज्यमौदयिके सूर्ये भावलग्नं स्फुटं च तत् ॥ ३॥अर्थ: सूर्योदय से जन्म तक हर 5 घटी (2 घंटे) में भाव लग्न एक राशि आगे बढ़ता है। जन्म तक बीती घटियों को 5 से भाग दें — जितनी राशि-अंश आएँ, उन्हें सूर्योदय के समय के सूर्य में जोड़ें; यही स्पष्ट भाव लग्न है।
होरा लग्न
तथा सार्धद्विघटिकामितादर्कोदयाद् द्विज ।
प्रयाति लग्नं तन्नाम होरालग्नं प्रचक्षते ॥ ४॥इष्टघट्यादिकं द्विघ्नं पञ्चाप्तं भादिकं च यत् ।
योज्यमौदयिके भानौ होरालग्नं स्फुटं हि तत् ॥ ५॥अर्थ: सूर्योदय से हर 2.5 घटी (1 घंटा) में होरा लग्न एक राशि आगे बढ़ता है। बीती घटियों को 2 से गुणा कर 5 से भाग दें, और सूर्योदय के सूर्य में जोड़ें।
घटी लग्न
एकैकघटिकामानात् लग्नं यद्याति भादिकम् ।
तदेव घटिकालग्नं कथितं नारदादिभिः ॥ ७॥राशयस्तु घटीतुल्याः पलार्धप्रमितांशकाः ।
योज्यमौदयिके भनौ घटीलग्नं स्फुटं हि तत् ॥ ८॥अर्थ: हर एक घटी (24 मिनट) में घटी लग्न एक राशि आगे बढ़ता है — जितनी घटियाँ, उतनी राशियाँ, और हर दो पल पर एक अंश (पल ÷ 2 = अंश)। इसे सूर्योदय के सूर्य में जोड़ें।
उदाहरण
सूर्योदय के समय सूर्य मेष 10° पर था, और जन्म सूर्योदय के 3 घंटे बाद हुआ (3 घंटे = 7.5 घटी)।
- भाव लग्न: 7.5 ÷ 5 = 1.5 राशि = 45° → मेष 10° + 45° = 55° = वृष 25°।
- होरा लग्न: 7.5 × 2 ÷ 5 = 3 राशि = 90° → मेष 10° + 90° = 100° = कर्क 10°।
- घटी लग्न: 7.5 राशि = 225° → मेष 10° + 225° = 235° = वृश्चिक 25°।
इनका उपयोग
क्रमादेषां च लग्नानां भावकोष्ठं पृथक् लिखेत् ।
ये ग्रहा यत्र भे तत्र ते स्थाप्या राशिलग्नवत् ॥ ९॥अर्थ: इन लग्नों के लिए अलग-अलग भाव-चक्र बनाएँ, और ग्रह जिस राशि में हों उन्हें वहीं रखें — जैसे जन्म लग्न की कुंडली में।
- होरा लग्न: परंपरा में धन और संपत्ति के लिए। पराशर ने वर्णद दशा में भी इसका उपयोग किया है (5.12–14)।
- घटी लग्न: परंपरा में पद, अधिकार और सत्ता के लिए।
- भाव लग्न: जन्म लग्न के साथ पुष्टि के लिए।
श्री लग्न के बारे में
कई लेखों में "श्री लग्न" और "महालक्ष्मी योग" भी बताए जाते हैं। श्री लग्न का नाम पराशर के इस अध्याय या हमारे संस्कृत पाठ में कहीं नहीं मिलता; यह बाद की जैमिनी परंपरा में प्रचलित हुआ। धन के लिए पराशर का अपना विशेष लग्न होरा लग्न है, और लक्ष्मी योग पराशर ने अलग से बताया है (36.27) — विवरण हमारे लेख काहल, लक्ष्मी और पारिजात योग में है।
सावधानी
ये तीनों लग्न सूर्योदय के सटीक समय पर निर्भर हैं। घटी लग्न हर 24 मिनट में राशि बदलता है, इसलिए जन्म समय या सूर्योदय में कुछ मिनट की गलती भी इसे बदल सकती है।
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पूछे जाने वाले प्रश्न
होरा लग्न कैसे निकालते हैं?
सूर्योदय से जन्म तक बीती घटियों को 2 से गुणा कर 5 से भाग दें — जितनी राशि-अंश आएँ, सूर्योदय के सूर्य में जोड़ें। यह हर 1 घंटे में एक राशि आगे बढ़ता है (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 5.4–5)।
घटी लग्न कितनी देर में बदलता है?
हर एक घटी यानी 24 मिनट में एक राशि (5.7–8)।
होरा लग्न और घटी लग्न से क्या देखा जाता है?
परंपरा में होरा लग्न से धन और घटी लग्न से पद-अधिकार का विचार होता है।
क्या श्री लग्न बृहत्पाराशर होराशास्त्र में है?
हमारे संस्कृत पाठ में श्री लग्न का नाम नहीं मिलता। पराशर का धन से जुड़ा विशेष लग्न होरा लग्न है।