विपरीत राजयोग — त्रिक भावेश त्रिक में: पराशर के भावेश-फल की कसौटी पर
संक्षेप में
विपरीत राजयोग तब कहा जाता है जब छठे, आठवें या बारहवें भाव (त्रिक) का स्वामी इन्हीं त्रिक भावों में हो — छठे से हर्ष, आठवें से सरल और बारहवें से विमल योग। बृहत्पाराशर होराशास्त्र के भावेशफलाध्याय (24) में इनका फल मिला-जुला है: अष्टमेश छठे में शत्रुजेता (24.90) और व्ययेश आठवें में लाभ देता है (24.140), पर षष्ठेश आठवें में रोग (24.68) और व्ययेश बारहवें में अधिक खर्च (24.144) देता है।
विपरीत राजयोग की प्रचलित परिभाषा
छठा (रोग-शत्रु), आठवाँ (आयु-संकट) और बारहवाँ (व्यय-हानि) भाव "त्रिक" या दुःस्थान कहलाते हैं। प्रचलित नियम है कि जब इन भावों का स्वामी इन्हीं में से किसी भाव में बैठता है, तो "बुरा, बुरे को काटता है" और अचानक उन्नति होती है। इसके तीन नाम बताए जाते हैं:
- हर्ष योग: छठे भाव का स्वामी 6, 8 या 12वें भाव में।
- सरल योग: आठवें भाव का स्वामी 6, 8 या 12वें भाव में।
- विमल योग: बारहवें भाव का स्वामी 6, 8 या 12वें भाव में।
क्या ये नाम बृहत्पाराशर होराशास्त्र में हैं?
हमारे पाठ (sanskritdocuments.org का 97 अध्यायों वाला संस्करण) में हर्ष, सरल और विमल नाम से ये योग नहीं मिलते। ये नाम कुछ अन्य संस्करणों, अनुवादों और बाद के ग्रंथों में मिलते हैं। पर पराशर ने भावेशफलाध्याय (24) में हर भावेश का हर भाव में फल दिया है — तो हम सीधे उन्हीं श्लोकों से देख सकते हैं कि यह नियम कितना टिकता है।
जहाँ पराशर विपरीत फल का समर्थन करते हैं
रन्ध्रेशे रिपुभावस्थे शत्रुजेता भवेज्जनः ।
रोगयुक्तशरीरश्च बाल्ये सर्पजलाद् भयम् ॥ ९०॥अर्थ: अष्टमेश छठे भाव में हो तो जातक शत्रुओं को जीतने वाला होता है, यद्यपि शरीर रोग से प्रभावित रहता है और बचपन में सर्प-जल से भय।
रन्ध्रेशे मृत्युभावस्थे जातो दीर्घायुषा युतः ।
निर्बले मध्यमायुः स्याच्चौरो निन्द्योऽन्यनिन्दकः ॥ ९२॥अर्थ: अष्टमेश आठवें भाव में हो तो दीर्घायु; निर्बल हो तो मध्यम आयु।
व्ययेशे मृत्युभावस्थे जातो लाभान्वितः सदा ।
प्रियवाङ् मध्यमायुश्च सम्पूर्णगुणसंयुतः ॥ १४०॥अर्थ: व्ययेश आठवें भाव में हो तो जातक सदा लाभ से युक्त, प्रिय बोलने वाला, मध्यम आयु वाला और सब गुणों से संपन्न होता है।
षष्ठेशे रिपुभावस्थे वैरं स्वज्ञातिमण्डलात् ।
अन्यैः सह भवेन् मैत्री सुखं मध्यं धनादिजम् ॥ ६६॥अर्थ: षष्ठेश छठे भाव में हो तो अपने कुटुंब से वैर, पर दूसरों से मित्रता, और धन-सुख मध्यम।
जहाँ पराशर उलटा फल बताते हैं
षष्ठेशेऽष्टमगे जातो रोगी शत्रुर्मनीषिणाम् ।
परद्रव्याभिलाषी च परदाररतोऽशुचिः ॥ ६८॥अर्थ: षष्ठेश आठवें भाव में हो तो जातक रोगी, विद्वानों का शत्रु और दूसरों के धन-स्त्री का अभिलाषी होता है।
व्ययेशे व्ययभावस्थे व्ययाधिक्यं हि जायते ।
न शरीरसुखं तस्य क्रोधी द्वेषपरो नृणाम् ॥ १४४॥अर्थ: व्ययेश बारहवें भाव में हो तो खर्च बहुत अधिक, शरीर-सुख नहीं, और स्वभाव क्रोधी।
रन्ध्रेशे व्ययभावस्थे कुकार्ये व्ययकृत् सदा ।
अल्पायुश्च भवेज्जातः सपापे च विशेषतः ॥ ९६॥अर्थ: अष्टमेश बारहवें भाव में हो तो बुरे कामों में खर्च और अल्पायु, विशेषकर पाप ग्रहों के साथ।
निष्कर्ष: नियम आधा सच है
पराशर के श्लोक दिखाते हैं कि "त्रिक भावेश त्रिक में = राजयोग" एक सामान्यीकरण है। कुछ स्थितियाँ (अष्टमेश छठे में, व्ययेश आठवें में) वास्तव में अच्छा फल देती हैं, तो कुछ (षष्ठेश आठवें में, अष्टमेश बारहवें में) कठिनाई देती हैं। इसके अलावा पराशर दशा के बारे में चेतावनी भी देते हैं:
कोणेशदृष्टिहीना ये त्रिकेशैः संयुता ग्रहाः ।
ते सर्वे स्वदशाकाले धनहानिकराः स्मृताः ॥ १३॥अर्थ: जो ग्रह त्रिक भावेशों से युक्त हों और जिन पर त्रिकोण के स्वामियों की दृष्टि न हो, वे अपनी दशा में धनहानि करते हैं।
इसलिए विपरीत राजयोग का निर्णय करते समय देखें:
- कौन सा त्रिक भावेश किस त्रिक भाव में है — ऊपर के श्लोकों से मिलाएँ।
- वह ग्रह किसी शुभ भाव का भी स्वामी है या नहीं (जैसे कुछ लग्नों में एक ही ग्रह छठे और नौवें का स्वामी होता है)।
- उस पर त्रिकोण के स्वामियों की दृष्टि है या नहीं।
- लग्नेश बलवान है या नहीं — लग्नेश निर्बल हो तो कोई योग ठीक से फल नहीं देता।
- फल मुख्यतः उस ग्रह की दशा में मिलता है।
अपनी कुंडली में त्रिक भावेशों की स्थिति मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें।
पूछे जाने वाले प्रश्न
विपरीत राजयोग कैसे बनता है?
प्रचलित परिभाषा के अनुसार जब छठे, आठवें या बारहवें भाव का स्वामी इन्हीं तीन भावों में से किसी में हो। छठे से हर्ष, आठवें से सरल और बारहवें से विमल योग कहा जाता है।
क्या हर्ष, सरल, विमल योग बृहत्पाराशर होराशास्त्र में हैं?
हमारे संस्कृत पाठ (sanskritdocuments.org, 97 अध्याय) में ये नाम नहीं मिलते; ये कुछ अन्य संस्करणों और बाद के ग्रंथों में हैं। पराशर के भावेशफलाध्याय (24) में इन स्थितियों का फल अलग-अलग दिया है।
क्या विपरीत राजयोग हमेशा शुभ होता है?
नहीं। पराशर के अनुसार अष्टमेश छठे में शत्रुजेता (24.90) और व्ययेश आठवें में लाभ देता है (24.140), पर षष्ठेश आठवें में रोग (24.68) और अष्टमेश बारहवें में बुरे खर्च देता है (24.96)।
विपरीत राजयोग का फल कब मिलता है?
मुख्यतः योग बनाने वाले ग्रह की महादशा या अंतर्दशा में, और तब अधिक जब लग्नेश बलवान हो।