दशा व गणित

विंशोत्तरी दशा — 120 वर्ष का चक्र, क्रम और दशा-शेष की गणना

लेखक: एस्ट्रो रामजी (Astro Raamji) · · 4 मिनट पढ़ें

विंशोत्तरी दशा

संक्षेप में

विंशोत्तरी दशा 120 वर्ष का ग्रह-काल चक्र है जिसे बृहत्पाराशर होराशास्त्र (46.14) कलियुग में मुख्य दशा बताता है। इसमें नौ ग्रहों की महादशाएँ इस क्रम और अवधि में आती हैं — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 वर्ष। पहली दशा जन्म-चंद्रमा के नक्षत्र से तय होती है और उसका शेष भाग नक्षत्र में चंद्रमा की बची दूरी से निकाला जाता है।

विंशोत्तरी दशा क्या है?

"विंशोत्तरी" का अर्थ है 120 (विंशति + उत्तर शत)। प्राचीन ग्रंथों में मनुष्य की पूर्ण आयु 120 वर्ष मानी गई है, और इसी के आधार पर यह दशा चक्र बना है। पराशर कहते हैं:

विंशोत्तरशतं पूर्णमायुः पूर्वमुदाहृतम् ।
कलै विंशोत्तरी तस्माद् दशा मुख्या द्विजोत्तम ॥ १४॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 46 (दशाध्यायः) · श्लोक 14

अर्थ: पूर्ण आयु 120 वर्ष बताई गई है, इसलिए कलियुग में विंशोत्तरी दशा मुख्य है।

पराशर ने बहुत-सी दशाएँ बताई हैं (अष्टोत्तरी, योगिनी, चर दशा आदि), पर फलादेश में सबसे अधिक प्रयोग विंशोत्तरी का ही होता है।

दशा का क्रम: कृत्तिका से गणना

कृत्तिकातः समारभ्य त्रिरावृत्य दशाधिपाः ।
आचंकुरागुशबुकेशुपूर्वा विहगाः क्रमात् ॥ १२॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 46 (दशाध्यायः) · श्लोक 12

अर्थ: कृत्तिका नक्षत्र से आरंभ करके तीन आवृत्तियों में दशा-स्वामी इस क्रम में हैं — आ (आदित्य/सूर्य), चं (चंद्र), कु (कुज/मंगल), रा (राहु), गु (गुरु), श (शनि), बु (बुध), के (केतु), शु (शुक्र)।

इसलिए 27 नक्षत्रों के स्वामी इस प्रकार हैं:

  • केतु: अश्विनी, मघा, मूल
  • शुक्र: भरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा
  • सूर्य: कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा
  • चंद्र: रोहिणी, हस्त, श्रवण
  • मंगल: मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा
  • राहु: आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा
  • गुरु: पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वा भाद्रपद
  • शनि: पुष्य, अनुराधा, उत्तरा भाद्रपद
  • बुध: आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती

किस ग्रह की दशा कितने वर्ष?

दशासमाः क्रमादेषां षड् दशाऽश्वा गजेन्दवः ।
नृपाला नवचन्द्राश्च नवचन्द्रा नगा नखाः ॥ १५॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 46 (दशाध्यायः) · श्लोक 15

यह श्लोक संख्याओं को शब्दों में (भूतसंख्या पद्धति से) देता है — "षड्" = 6, "दश" = 10, "अश्व" = 7, "गजेन्दु" = 18, "नृपाल" = 16, "नवचन्द्र" = 19, "नग" = 7, "नख" = 20। उपलब्ध पाठ में बुध के लिए भी "नवचन्द्रा" लिखा है, जो लिपिकीय भेद प्रतीत होता है — 120 वर्ष का योग और पूरी परंपरा बुध की दशा 17 वर्ष ही मानती है। सूर्य से क्रम में:

  • सूर्य — 6 वर्ष
  • चंद्र — 10 वर्ष
  • मंगल — 7 वर्ष
  • राहु — 18 वर्ष
  • गुरु — 16 वर्ष
  • शनि — 19 वर्ष
  • बुध — 17 वर्ष
  • केतु — 7 वर्ष
  • शुक्र — 20 वर्ष

कुल = 120 वर्ष।

पहली दशा और दशा-शेष कैसे निकालें?

जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में है, उसी नक्षत्र का स्वामी पहली महादशा देता है। पर जन्म के समय उस दशा का कुछ भाग बीत चुका होता है। पराशर इसकी गणना बताते हैं:

दशामनां भयातघ्नं भभोगेन हृतं फलम् ।
दशाया भुक्तवर्षाद्य भोग्यं मानाद् विशोधितम् ॥ १६॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 46 (दशाध्यायः) · श्लोक 16

सरल विधि: एक नक्षत्र 13°20' (13.333°) का होता है।

  • दशा का भोगा हुआ भाग = (नक्षत्र में चंद्रमा की बीती दूरी ÷ 13.333) × उस ग्रह की पूरी दशा।
  • दशा-शेष = पूरी दशा − भोगा हुआ भाग।

उदाहरण: जन्म के समय चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में 10° पर है। अश्विनी का स्वामी केतु (7 वर्ष)।

  • बीता भाग = 10 ÷ 13.333 = 0.75
  • भोगी गई दशा = 0.75 × 7 = 5.25 वर्ष
  • दशा-शेष = 7 − 5.25 = 1.75 वर्ष (लगभग 1 वर्ष 9 माह)

इसके बाद शुक्र (20), फिर सूर्य (6), चंद्र (10)… क्रम से दशाएँ चलती हैं।

अंतर्दशा और प्रत्यंतर्दशा

हर महादशा के भीतर नौ अंतर्दशाएँ होती हैं, उसी क्रम में, महादशा-स्वामी से आरंभ होकर। किसी अंतर्दशा की अवधि = (महादशा वर्ष × अंतर्दशा ग्रह के वर्ष) ÷ 120। जैसे शनि महादशा में गुरु की अंतर्दशा = 19 × 16 ÷ 120 = 2.53 वर्ष (लगभग 2 वर्ष 6 माह 12 दिन)।

सटीकता क्यों ज़रूरी है?

दशा-शेष पूरी तरह चंद्रमा की डिग्री पर निर्भर है। चंद्रमा एक दिन में लगभग 13° चलता है, इसलिए जन्म समय में कुछ मिनट की गलती या कमज़ोर गणित से दशाओं की तिथियाँ महीनों आगे-पीछे हो सकती हैं। हमारी जन्म पत्रिका स्विस एफिमेरिस और लाहिड़ी (चित्रपक्ष) अयनांश से चंद्रमा की सटीक स्थिति निकालकर विंशोत्तरी दशा की तिथियाँ दिखाती है।

पूछे जाने वाले प्रश्न

विंशोत्तरी दशा कितने वर्ष की होती है?

कुल 120 वर्ष। बृहत्पाराशर होराशास्त्र (46.14) के अनुसार मनुष्य की पूर्ण आयु 120 वर्ष मानी गई है, इसलिए यह दशा कलियुग में मुख्य है।

किस ग्रह की महादशा कितने वर्ष की होती है?

केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19 और बुध 17 वर्ष।

पहली महादशा कैसे तय होती है?

जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में है, उसका स्वामी पहली महादशा देता है। जैसे अश्विनी, मघा या मूल में चंद्रमा हो तो केतु की दशा से आरंभ।

दशा-शेष कैसे निकालें?

नक्षत्र में चंद्रमा की बची दूरी को 13°20' से भाग देकर उस ग्रह की पूरी दशा से गुणा करें। यही जन्म के समय शेष दशा है।

अंतर्दशा की अवधि कैसे निकालें?

महादशा के वर्ष × अंतर्दशा ग्रह के वर्ष ÷ 120। जैसे शनि में गुरु = 19 × 16 ÷ 120 ≈ 2.53 वर्ष।