षड्बल — ग्रह का बल कैसे मापें: बृहत्पाराशर होराशास्त्र के छह बल
संक्षेप में
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (27.25) के अनुसार ग्रह का बल छह प्रकार का है — स्थान, दिक्, काल, दृक्, चेष्टा और नैसर्गिक बल; इनका योग षड्बल है। पराशर (27.32–33) हर ग्रह का आवश्यक बल देते हैं: सूर्य 390, चंद्र 360, मंगल 300, बुध 420, गुरु 390, शुक्र 330 और शनि 300 षष्ट्यांश। इससे अधिक बल वाला ग्रह बलवान माना जाता है, और कई योग हों तो उनमें सबसे बलवान ग्रह ही फल देता है (27.37–38)।
षड्बल क्यों ज़रूरी है?
कुंडली में एक ही योग दो लोगों को अलग फल देता है। कारण है ग्रह का बल। पराशर स्वयं भावेश-फल के अंत में कहते हैं कि पूर्ण बली ग्रह पूरा, आधा बली आधा और निर्बल चौथाई फल देता है (24.147–148)। यह बल मापने का शास्त्रीय तरीका है — षड्बल, जिसे पराशर ने स्पष्टबलाध्याय (अध्याय 27) में दिया है।
छह बल
भागीकृतं त्रिभिर्भक्तं लब्धं चेष्टाबलं त्विति ।
स्थानदिक्कालदृक्चेष्टानिसर्गोत्थं च षड्विधम् ॥ २५॥अर्थ: (चेष्टा केंद्र को भागों में बदलकर तीन से भाग देने पर चेष्टा बल मिलता है।) इस प्रकार बल छह प्रकार का है — स्थान, दिक्, काल, दृक्, चेष्टा और नैसर्गिक।
- स्थान बल: उच्च-नीच की दूरी, स्वराशि-मित्र राशि, सात वर्गों में स्थिति, केंद्र आदि भाव और द्रेष्काण से।
- दिक् बल: दिशा का बल — गुरु-बुध लग्न में, सूर्य-मंगल दशम में, शनि सप्तम में, और चंद्र-शुक्र चतुर्थ में पूर्ण दिग्बली (27.7)।
- काल बल: दिन-रात, पक्ष, वर्ष-मास-दिन-होरा के स्वामी और अयन से।
- चेष्टा बल: गति से — वक्री ग्रह को पूरा बल मिलता है (27.22)।
- नैसर्गिक बल: स्वाभाविक बल, जो हर कुंडली में समान है।
- दृक् बल: शुभ ग्रहों की दृष्टि से बढ़ता और पाप ग्रहों की दृष्टि से घटता है (27.19)।
नैसर्गिक बल का क्रम
तन्मानां सप्तहृत्षष्टिरेकाद्येकोत्तरैर्हता ।
शमंबुगुशुचंरादिखेटानां क्रमतो द्विज ॥ १४॥अर्थ: 60 को 7 से भाग देकर 1 से 7 तक गुणा करें — क्रमशः शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चंद्र और सूर्य का नैसर्गिक बल। यानी शनि ≈ 8.57, मंगल ≈ 17.14, बुध ≈ 25.71, गुरु ≈ 34.29, शुक्र ≈ 42.86, चंद्र ≈ 51.43 और सूर्य 60 षष्ट्यांश। सूर्य स्वभाव से सबसे बली और शनि सबसे कम।
हर ग्रह का आवश्यक बल
अंकाग्नयोऽङ्गरामाश्च खाग्नया करसिन्धवः ।
नवाग्नयः सुरास्त्रिंशद् दशसंगुणिताः क्रमात् ॥ ३२॥रव्यादीनां बलैक्यश्चेत् तदा सुबलिनो मताः ।
अधिकं पूर्णमेव स्याद् बलं चेद्बलिनो द्विज ॥ ३३॥अर्थ: 39, 36, 30, 42, 39, 33 और 30 को दस से गुणा करें — यह सूर्य से शनि तक का आवश्यक बल है। ग्रह का कुल बल इससे अधिक हो तो वह बलवान माना जाता है।
- सूर्य: 390 षष्ट्यांश (6.5 रूप)
- चंद्र: 360 (6 रूप)
- मंगल: 300 (5 रूप)
- बुध: 420 (7 रूप)
- गुरु: 390 (6.5 रूप)
- शुक्र: 330 (5.5 रूप)
- शनि: 300 (5 रूप)
(60 षष्ट्यांश = 1 रूप।)
कई योग हों तो फल कौन देगा?
एवं कृत्वा बलैक्यंच ततश्चिन्त्यम् फलं द्विज ।
भावस्थानग्रहैः प्रोक्तयोगे ये योगहेतवः ॥ ३७॥तेषां मध्ये बली कर्ता स एवाऽस्य फलप्रदः ।
योगेष्वाप्तेषु बहुषु नीतिरेवं प्रकीर्तिता ॥ ३८॥अर्थ: इस प्रकार बलों का योग करके फल का विचार करें। किसी योग को बनाने वाले ग्रहों में जो सबसे बली हो, वही "कर्ता" है और वही फल देता है — अनेक योग होने पर यही नीति है।
व्यवहार में षड्बल
- कोई योग देखें, तो उसे बनाने वाले ग्रहों का षड्बल भी देखें।
- आवश्यक बल से कम ग्रह का योग प्रायः आधा-अधूरा फल देता है।
- दशा का फल भी दशानाथ के बल से तय होता है।
- षड्बल की गणना सटीक ग्रह-स्पष्ट, जन्म समय और स्थान पर निर्भर है — इसे हाथ से करना कठिन है, इसलिए सही सॉफ़्टवेयर ज़रूरी है।
हमारी मुफ़्त जन्म पत्रिका में ग्रहों का बल सटीक गणना से दिखाया जाता है।
पूछे जाने वाले प्रश्न
षड्बल क्या है?
ग्रह के छह बलों — स्थान, दिक्, काल, दृक्, चेष्टा और नैसर्गिक — का योग (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 27.25)।
किस ग्रह को कितना षड्बल चाहिए?
पराशर (27.32) के अनुसार सूर्य 390, चंद्र 360, मंगल 300, बुध 420, गुरु 390, शुक्र 330 और शनि 300 षष्ट्यांश।
नैसर्गिक बल में सबसे बली ग्रह कौन है?
सूर्य (60 षष्ट्यांश), फिर चंद्र, शुक्र, गुरु, बुध, मंगल और सबसे कम शनि (27.14)।
कई योग हों तो फल कौन सा ग्रह देता है?
पराशर (27.37–38) के अनुसार योग बनाने वाले ग्रहों में सबसे बलवान ग्रह ही कर्ता होता है और वही फल देता है।