दशा व गणित

सप्तमांश कुंडली (D7) — बृहत्पाराशर होराशास्त्र का सूत्र और संतान का विचार

लेखक: एस्ट्रो रामजी (Astro Raamji) · · 3 मिनट पढ़ें

सप्तमांश कुंडली (D7)

संक्षेप में

सप्तमांश (D7) में हर राशि के 30° को लगभग 4°17′ के सात भागों में बाँटा जाता है। बृहत्पाराशर होराशास्त्र (6.10) के अनुसार विषम राशि में गिनती उसी राशि से और सम राशि में उससे सातवीं राशि से शुरू होती है। पराशर (7.2) कहते हैं कि पुत्र-पौत्र आदि का विचार सप्तमांश से करें, इसलिए संतान के प्रश्न में जन्म कुंडली के पंचम भाव के साथ D7 देखा जाता है।

सप्तमांश क्या है?

सप्तमांश यानी राशि का सातवाँ भाग। पराशर ने सोलह वर्गों के उपयोग बताते हुए कहा है:

द्रेष्काणे भ्रातृजं सौख्यं तुर्यांशे भाग्यचिन्तनम् ।
पुत्रपौत्रादिकानां वै चिन्तनं सप्तमांशके ॥ २॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 7 (वर्गविवेकाध्यायः) · श्लोक 2

अर्थ: द्रेष्काण से भाई-बहनों का सुख, चतुर्थांश से भाग्य, और सप्तमांश से पुत्र-पौत्र आदि (संतान और वंश) का विचार करें।

गणना का सूत्र

सप्तांशपास्त्वोजगृहे गणनीया निजेशतः ।
युग्मराशौ तु विज्ञेयाः सप्तमर्क्षादिनायकात् ॥ १०॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 6 (षोडशवर्गाध्यायः) · श्लोक 10

अर्थ: विषम राशि में सप्तमांश उसी राशि के स्वामी (यानी उसी राशि) से गिने जाते हैं, और सम राशि में उससे सातवीं राशि से।

  • हर सप्तमांश = 30° ÷ 7 = 4°17′8.6″ (लगभग 4.29°)।
  • विषम राशियाँ (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ): पहला सप्तमांश उसी राशि का।
  • सम राशियाँ (वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन): पहला सप्तमांश उससे सातवीं राशि का।

उदाहरण

मान लीजिए गुरु कर्क 10° पर है।

  • कर्क सम राशि है, इसलिए गिनती उससे सातवीं राशि मकर से शुरू होगी।
  • 10° ÷ 4.29° = 2.33, यानी गुरु तीसरे सप्तमांश (8°34′ से 12°51′) में है।
  • मकर (1), कुंभ (2), मीन (3) — सप्तमांश राशि मीन।
  • गुरु अपनी ही राशि मीन के सप्तमांश में है — संतान के कारक के लिए यह शुभ संकेत है।

सप्तमांश से संतान का विचार

सप्तमांश अकेले नहीं, जन्म कुंडली के पंचम भाव के साथ पढ़ा जाता है। पराशर के पंचम भाव के नियम (अध्याय 16) — जैसे पंचमेश का केंद्र-त्रिकोण में होना शुभ और 6, 8, 12 में होना बाधक — इन्हें पहले जन्म कुंडली में देखें, फिर D7 में पुष्टि करें:

  • D7 लग्न और उसका स्वामी: बलवान हो तो संतान-सुख की पुष्टि।
  • D7 का पाँचवाँ भाव और उसका स्वामी।
  • गुरु की D7 में स्थिति: गुरु संतान का कारक है।
  • जन्म कुंडली के पंचमेश की D7 में स्थिति: स्वराशि, उच्च या मित्र राशि में हो तो शुभ।

पंचम भाव के विस्तृत नियम मूल श्लोकों सहित हमारे लेख संतान योग में दिए हैं।

सही जन्म समय क्यों ज़रूरी?

सप्तमांश लगभग 4°17′ का होता है, इसलिए D7 लग्न औसतन लगभग 17 मिनट में बदल जाता है। जन्म समय में 15–20 मिनट की गलती से पूरा D7 लग्न बदल सकता है।

ज्योतिष एक मार्गदर्शन है, चिकित्सा का विकल्प नहीं। संतान से जुड़ी कठिनाई में चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

हमारी मुफ़्त जन्म पत्रिका में सप्तमांश सहित सोलहों वर्ग अपने आप बनते हैं।

पूछे जाने वाले प्रश्न

सप्तमांश कुंडली कैसे बनती है?

हर राशि को लगभग 4°17′ के सात भागों में बाँटते हैं। विषम राशि में गिनती उसी राशि से और सम राशि में उससे सातवीं राशि से शुरू होती है (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 6.10)।

सप्तमांश से क्या देखा जाता है?

पराशर (7.2) के अनुसार पुत्र-पौत्र आदि — यानी संतान और वंश।

संतान के लिए D7 में क्या देखें?

D7 का लग्न और पंचम भाव, गुरु की स्थिति, और जन्म कुंडली के पंचमेश की D7 में स्थिति।

D7 लग्न कितनी देर में बदलता है?

औसतन लगभग 17 मिनट में, इसलिए सही जन्म समय ज़रूरी है।