विवाह

सप्तमेश (सातवें भाव का स्वामी) 12 भावों में — पराशर के मूल श्लोक और अर्थ

लेखक: एस्ट्रो रामजी (Astro Raamji) · · 3 मिनट पढ़ें

सप्तमेश 12 भावों में

संक्षेप में

बृहत्पाराशर होराशास्त्र (24.73–84) में सप्तमेश के बारहों भावों के फल दिए हैं। सप्तमेश सातवें भाव में हो तो दाम्पत्य सुख, पाँचवें में हो तो सम्मान और धन, और 6, 8 या 12वें भाव में हो तो जीवनसाथी के स्वास्थ्य या सुख में कमी बताई गई है। पराशर (24.147–148) के अनुसार ग्रह पूर्ण बली हो तो पूरा, आधा बली हो तो आधा और निर्बल हो तो चौथाई फल मिलता है।

सप्तमेश क्यों महत्वपूर्ण है?

सातवाँ भाव विवाह, जीवनसाथी और साझेदारी का भाव है। इसका स्वामी — सप्तमेश — जिस भाव में बैठता है, विवाह से जुड़ा फल उसी भाव के विषयों से जुड़ जाता है। पराशर ने भावेशफलाध्याय (अध्याय 24) में हर भावेश के बारहों भावों के फल बताए हैं। यहाँ सप्तमेश ("दारेश") के श्लोक क्रम से दिए हैं।

ये फल पुरुष की कुंडली के शब्दों में लिखे गए हैं ("भार्या")। स्त्री की कुंडली में परंपरा इन्हें पति के लिए लागू करती है।

पहले से छठे भाव तक

लग्न (पहले भाव) में:

दारेशे लग्नगे जातः परदारेषु लम्पटः ।
दुष्टो विचक्षणोऽधीरो जनो वातरुजान्वितः ॥ ७३॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 73

परस्त्री में आसक्ति की प्रवृत्ति, चतुर पर अधीर स्वभाव और वात रोग।

दूसरे भाव में:

दारेशे धनगे जातो बहुस्त्रीभिः समन्वितः ।
दारयोगाद्धनाप्तिश्च दीर्घसूत्री च मानवः ॥ ७४॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 74

अनेक स्त्रियों से संबंध, जीवनसाथी के माध्यम से धन, और काम को टालने की आदत।

तीसरे भाव में:

दारेशे सहजे जातो मृतापत्यो हि मानवः ।
कदाचिज्जायते पुत्री यत्नात् पुत्रोऽपि जीवति ॥ ७५॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 75

संतान के बारे में कष्ट बताया गया है — कन्या का जन्म हो सकता है और पुत्र प्रयास से जीवित रहता है।

चौथे भाव में:

दारेशे सुखभावस्थे जाया नास्य वशे सदा ।
स्वयं सत्यप्रियो धीमान् धर्मात्मा दन्तरोगयुक् ॥ ७६॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 76

जीवनसाथी अपने वश में नहीं रहता; जातक स्वयं सत्यप्रिय, बुद्धिमान और धर्मात्मा होता है, दाँतों का रोग हो सकता है।

पाँचवें भाव में:

दारेशे पञ्चमे जातो मानि सर्वगुणान्वितः ।
सर्वदा हर्षयुक्तश्च तथा सर्वधनाधिपः ॥ ७७॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 77

सम्मानित, सभी गुणों से युक्त, सदा प्रसन्न और सब प्रकार के धन का स्वामी — यह सबसे शुभ स्थितियों में है।

छठे भाव में:

दारेशे रिपुभावस्थे भार्या तस्य रुजान्विता ।
स्त्रिया सहाऽथ वा वैरं स्वयं क्रोधी सुखोज्झितः ॥ ७८॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 78

जीवनसाथी रोगी हो सकता है, या उससे वैर रहता है; जातक स्वयं क्रोधी और सुख से वंचित।

सातवें से बारहवें भाव तक

सातवें भाव (अपने ही भाव) में:

दारेशे सप्तमे भावे जातो दारसुखान्वितः ।
धीरो विचक्षणो धीमान् केवलं वातरोगवान् ॥ ७९॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 79

दाम्पत्य सुख, धैर्यवान, चतुर और बुद्धिमान — केवल वात रोग की प्रवृत्ति।

आठवें भाव में:

दारेशे मृत्युभावस्थे जातो दारसुखोज्झितः ।
भार्याऽपि रोगयुक्ताऽस्य दुःशीलाऽपि न चानुगा ॥ ८०॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 80

दाम्पत्य सुख में कमी; जीवनसाथी रोगी, कठोर स्वभाव का या साथ न देने वाला।

नौवें भाव में:

दारेशे धर्मभावस्थे नानास्त्रीभिः समागमः ।
जायाहृतमना जातो बह्वारम्भकरो नरः ॥ ८१॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 81

अनेक स्त्रियों से संपर्क, मन जीवनसाथी में रमा रहता है, और अनेक काम शुरू करने वाला।

दसवें भाव में:

दारेशे कर्मभावस्थे नास्य जाया वशानुगा ।
स्वयं धर्मरतो जातो धनपुत्रादिसंयुतः ॥ ८२॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 82

जीवनसाथी वश में नहीं रहता; जातक स्वयं धर्म में रत, धन और पुत्रों से युक्त।

ग्यारहवें भाव में:

दारेशे लाभभावस्थे दारैरर्थसमागमः ।
पुत्रादिसुखमल्पं च जनः कन्यप्रजो भवेत् ॥ ८३॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 83

जीवनसाथी के माध्यम से धन; संतान का सुख कम और कन्या संतान अधिक।

बारहवें भाव में:

दारेशे व्ययगे जातो दरिद्रः कृपणोऽपि वा ।
भार्या;पि व्ययशीलाऽस्य वस्त्राजीवी नरो भवेत् ॥ ८४॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 84

धन की कमी या कंजूसी, जीवनसाथी खर्चीला, और वस्त्र से जुड़ी आजीविका।

सबसे ज़रूरी नियम: बल के अनुसार फल

अध्याय के अंत में पराशर कहते हैं कि ये सभी फल ग्रह के बल-अबल को देखकर ही कहें:

विभिन्नयोस्तु फलयोर्द्वयोः प्राप्तिर्भवेद्ध्रुवम् ।
ग्रहे पूर्णबले पुर्णमर्धमर्धबले फलम् ॥ १४७॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 147
पादं हीनबले खेटे ज्ञेयमित्थं बुधैरिति ।
उक्तं भावस्थितानां ते भावेशानां पलं मया ॥ १४८॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 24 (भावेशफलाध्यायः) · श्लोक 148

अर्थ: ग्रह पूर्ण बली हो तो पूरा फल, आधा बली हो तो आधा, और निर्बल हो तो चौथाई फल मिलता है।

इसलिए ऊपर के फल अंतिम निर्णय नहीं हैं। सप्तमेश अपनी या उच्च राशि में हो, शुभ ग्रह उसे देखें, और नवांश में भी अच्छा हो, तो अशुभ भाव का फल बहुत हल्का हो जाता है। पराशर स्वयं कहते हैं कि सप्तमेश स्वराशि या उच्च में हो तो पूर्ण दाम्पत्य सुख मिलता है (18.1)।

अपनी कुंडली में सप्तमेश की स्थिति मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें, और विवाह मिलान के लिए विवाह मिलान टूल का उपयोग करें।

पूछे जाने वाले प्रश्न

सप्तमेश किस भाव में सबसे शुभ है?

बृहत्पाराशर होराशास्त्र (24.77, 24.79) के अनुसार पाँचवें भाव में सम्मान, गुण और धन, और सातवें भाव में दाम्पत्य सुख मिलता है।

सप्तमेश आठवें भाव में हो तो क्या होता है?

पराशर (24.80) दाम्पत्य सुख में कमी और जीवनसाथी के स्वास्थ्य या स्वभाव में कठिनाई बताते हैं। पर फल सप्तमेश के बल और शुभ दृष्टि से बहुत बदलता है।

क्या सप्तमेश के फल स्त्री की कुंडली पर भी लागू होते हैं?

श्लोक पुरुष की कुंडली के शब्दों में हैं। परंपरा में स्त्री की कुंडली में इन्हें पति के लिए लागू किया जाता है।

क्या ये फल हमेशा पूरे मिलते हैं?

नहीं। पराशर (24.147–148) कहते हैं कि पूर्ण बली ग्रह पूरा, आधा बली आधा और निर्बल ग्रह चौथाई फल देता है।