विवाह

संतान योग — बृहत्पाराशर होराशास्त्र के पंचम भाव फल से संतान-सुख का विचार

लेखक: एस्ट्रो रामजी (Astro Raamji) · · 3 मिनट पढ़ें

संतान योग

संक्षेप में

बृहत्पाराशर होराशास्त्र (16.1–2) के अनुसार लग्नेश पाँचवें भाव में हो, पंचमेश पाँचवें में हो, या पंचमेश केंद्र-त्रिकोण में हो, तो पूर्ण संतान-सुख मिलता है। पंचमेश 6, 8 या 12वें भाव में हो, या अस्त, पाप-पीड़ित और निर्बल हो, तो संतान में बाधा बताई गई है। पंचम भाव पर बलवान बुध, गुरु और शुक्र की दृष्टि अनेक संतानों का योग है (16.12)।

संतान का विचार कहाँ से होता है?

ज्योतिष में संतान का मुख्य भाव पाँचवाँ भाव है, उसका स्वामी पंचमेश और संतान का कारक ग्रह गुरु। पराशर ने पञ्चमभावफलाध्याय (अध्याय 16) में इनकी स्थितियों से संतान-सुख का विस्तार से विचार किया है। साथ ही वर्गविवेक में वे कहते हैं कि पुत्र-पौत्र का सूक्ष्म विचार सप्तमांश (D7) से होता है (7.2)।

पूर्ण संतान-सुख के योग

अथ पञ्चमभावस्य कथयामि फलं द्विज ।
लग्नपे सुतभावस्थे सुतपे च सुते स्थिते ॥ १॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 16 (पञ्चमभावफलाध्यायः) · श्लोक 1
केन्द्रत्रिकोणसंस्थे वा पूर्णं पुत्रसुखं वदेत् ।
षष्ठाष्टमव्ययस्थे तु सुताधीशे त्वपुत्रता ॥ २॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 16 (पञ्चमभावफलाध्यायः) · श्लोक 2

अर्थ: लग्नेश पाँचवें भाव में हो, पंचमेश पाँचवें में हो, या पंचमेश केंद्र या त्रिकोण में हो, तो पूर्ण पुत्र-सुख कहना चाहिए। पंचमेश छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो संतान-हीनता का योग है।

सुते ज्ञजीवशुक्रैश्च सबलैरवलोकिते ।
भवन्ति बहवः पुत्राः सुतेशे हि बलान्विते ॥ १२॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 16 (पञ्चमभावफलाध्यायः) · श्लोक 12

अर्थ: पाँचवें भाव पर बलवान बुध, गुरु और शुक्र की दृष्टि हो और पंचमेश भी बलवान हो, तो अनेक पुत्र होते हैं।

पुत्रस्थानाधिपे स्वोच्चे लग्नाद्वा द्वित्रिकोणगे ।
गुरुणा संयुते दृष्टे पुत्रभाग्यमुपैति सः ॥ १६॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 16 (पञ्चमभावफलाध्यायः) · श्लोक 16

अर्थ: पंचमेश उच्च राशि में हो, या लग्न से दूसरे अथवा त्रिकोण भाव में हो, और गुरु से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक पुत्र-भाग्य पाता है।

संतान में बाधा के योग

सुतेशेस्तङ्गते वाऽपि पापाक्रान्ते च निर्बले ।
तदा न जायते पुत्रो जातो वा म्रियते ध्रुवम् ॥ ३॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 16 (पञ्चमभावफलाध्यायः) · श्लोक 3

अर्थ: पंचमेश अस्त हो, पाप ग्रहों से पीड़ित हो और निर्बल हो, तो संतान-सुख में गंभीर बाधा बताई गई है।

षष्ठाष्टमव्ययस्थो वा नीचो वा शत्रुराशिगः ।
सुतेशश्च सुते तस्य कष्टाद् पुत्रं विनिर्दिशेत् ॥ ८॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 16 (पञ्चमभावफलाध्यायः) · श्लोक 8

अर्थ: पंचमेश 6, 8 या 12वें भाव में, नीच या शत्रु राशि में हो, तो संतान कठिनाई से होती है — यानी देर से या प्रयास के बाद।

ध्यान दें कि 16.8 में "कष्टात्" शब्द है — कठिनाई से, न कि "कभी नहीं"। अधिकांश कुंडलियों में ऐसे योग देरी या प्रयास दिखाते हैं।

पूरी जाँच के चार स्तर

  • पंचम भाव: उसमें कौन से ग्रह हैं, और किनकी दृष्टि है।
  • पंचमेश: किस भाव और राशि में है, अस्त या पीड़ित तो नहीं।
  • गुरु (कारक): बलवान है या नीच, अस्त, पाप-पीड़ित।
  • सप्तमांश (D7) और दशा: D7 में पंचमेश और गुरु की स्थिति, और विवाह के बाद चलने वाली दशाएँ।

दोनों जीवनसाथियों की कुंडली साथ देखना ज़रूरी है — केवल एक कुंडली से निर्णय अधूरा रहता है।

बाधा का कारण और उपाय

पराशर ने पूर्वजन्मशाप अध्याय (83) में संतान-बाधा के कारण के रूप में सर्पशाप, पितृशाप, मातृशाप आदि के योग और उनके उपाय विस्तार से दिए हैं। पितृशाप वाले योग और उनके उपाय हमारे लेख पितृ दोष में मूल श्लोकों सहित दिए हैं।

ज्योतिष एक मार्गदर्शन है, चिकित्सा का विकल्प नहीं। संतान से जुड़ी कठिनाई में योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें और ज्योतिषीय उपाय साथ में करें।

अपनी कुंडली का पंचम भाव और गुरु मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें, और दोनों कुंडलियों की संयुक्त जाँच के लिए व्यक्तिगत परामर्श लें।

पूछे जाने वाले प्रश्न

कुंडली में संतान योग कैसे देखें?

पाँचवाँ भाव, पंचमेश और गुरु देखें। बृहत्पाराशर होराशास्त्र (16.1–2) के अनुसार लग्नेश या पंचमेश पाँचवें भाव में, या पंचमेश केंद्र-त्रिकोण में हो तो पूर्ण संतान-सुख मिलता है।

संतान में देरी का योग क्या है?

पराशर (16.8) के अनुसार पंचमेश 6, 8 या 12वें भाव में, नीच या शत्रु राशि में हो तो संतान कठिनाई से होती है।

संतान के लिए कौन सा वर्ग चार्ट देखा जाता है?

सप्तमांश (D7)। पराशर (7.2) कहते हैं कि पुत्र-पौत्रादि का विचार सप्तमांश से करें।

क्या ज्योतिषीय उपाय चिकित्सा का विकल्प हैं?

नहीं। ज्योतिष मार्गदर्शन देता है; संतान से जुड़ी कठिनाई में चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।