सूर्य संक्रांति, खरमास और मलमास — खगोलीय अर्थ और संक्रांति में जन्म की शांति (पराशर)
संक्षेप में
सूर्य जब एक राशि से दूसरी में प्रवेश करता है, उसे संक्रांति कहते हैं — साल में बारह। सूर्य के धनु और मीन राशि में रहने के लगभग एक-एक महीने को खरमास कहा जाता है, और जिस चंद्र मास में कोई संक्रांति न पड़े वह मलमास (अधिक मास) होता है। बृहत्पाराशर होराशास्त्र (90.2) के अनुसार संक्रांति के समय जन्म हो तो दरिद्रता और दुःख बताया गया है, और शांति से सुख मिलता है — जिसकी विधि में नवग्रह यज्ञ और मृत्युंजय मंत्र का जप-हवन है।
संक्रांति क्या है?
सूर्य आकाश में लगभग एक वर्ष में बारह राशियों का चक्र पूरा करता है। जिस क्षण सूर्य एक राशि छोड़कर अगली में प्रवेश करता है, वह संक्रांति है। मकर संक्रांति इनमें सबसे प्रसिद्ध है, पर हर महीने एक संक्रांति होती है।
सूर्य की गति पूरे वर्ष एक समान नहीं होती, इसलिए हर राशि में सूर्य के रहने का समय लगभग 29.5 से 31.5 दिन तक बदलता है।
खरमास: सूर्य धनु और मीन में
परंपरा में सूर्य जब धनु और मीन राशि (दोनों गुरु की राशियाँ) में होता है, तो लगभग एक-एक महीने को खरमास कहा जाता है, और इसमें विवाह आदि मांगलिक कार्य टाले जाते हैं। यह नियम मुहूर्त ग्रंथों और लोक-परंपरा का है; बृहत्पाराशर होराशास्त्र जन्म-कुंडली का ग्रंथ है और उसमें खरमास का नियम नहीं है।
मलमास (अधिक मास): खगोलीय कारण
- चंद्र मास (एक अमावस्या से अगली तक) लगभग 29.53 दिन का होता है।
- सूर्य का एक राशि में रहना औसतन 30.44 दिन का होता है।
- इसलिए कभी-कभी कोई पूरा चंद्र मास ऐसा निकल जाता है जिसमें सूर्य राशि नहीं बदलता — उस मास में कोई संक्रांति नहीं होती। यही अधिक मास या मलमास है।
- यह लगभग हर 32–33 महीने में एक बार आता है, और इसी से चंद्र पंचांग सौर वर्ष से तालमेल बनाए रखता है।
पराशर: संक्रांति में जन्म
महर्षि पराशर ने संक्रांति के समय जन्म के लिए पूरा अध्याय (90) दिया है:
घोराध्वांक्षीमहोदर्यो मन्दा मन्दाकिनी तथा ।
मिश्रा च राक्षसी सूर्यसंक्रान्तिः सूर्यवासरात् ॥ १॥अर्थ: रविवार से आरंभ करके वार के अनुसार सूर्य संक्रांति के सात नाम हैं — घोरा, ध्वांक्षी, महोदरी, मंदा, मंदाकिनी, मिश्रा और राक्षसी।
संक्रान्तौ च नरो जातो भवेद् दारिद्र्य दुःखभाक् ।
शान्त्या सुखमवाप्नोति ततः शान्तिविधि ब्रुवे ॥ २॥अर्थ: संक्रांति में जन्मा व्यक्ति दरिद्रता और दुःख का भागी होता है; शांति करने से सुख पाता है, इसलिए शांति की विधि बताता हूँ।
शांति की विधि (संक्षेप में)
नवग्रहमखं कुर्यात् तस्य दोषोपशान्तये ।
गृहस्य पूर्वदिग्भागे गोमयेनोपलिप्य च ॥ ३॥अर्थ: उस दोष की शांति के लिए नवग्रह यज्ञ करें; घर के पूर्व भाग को गोबर से लीपें।
आगे के श्लोकों (90.4–18) में पूरी विधि है:
- धान, चावल और तिल की तीन राशियाँ बनाकर उन पर अष्टदल कमल बनाएँ, और आचार्य का वरण करें।
- तीर्थजल, औषधि, पल्लव और पंचगव्य से भरे कलश स्थापित करें।
- बीच में संक्रांति की प्रतिमा, और उसके दोनों ओर सूर्य (अधिदेवता) और चंद्र (प्रत्यधिदेवता) की प्रतिमाएँ स्थापित करें।
- प्रधान प्रतिमा की पूजा त्र्यम्बक (महामृत्युंजय) मंत्र से, सूर्य की "उत्सूर्य" मंत्र से और चंद्र की "आप्यायस्व" मंत्र से करें।
- सामर्थ्य अनुसार 1,008, 108 या 28 बार जप और उतना ही हवन — समिधा, घी और चरु से, फिर मृत्युंजय मंत्र से तिल-हवन।
ततः स्विष्टकृतं हुत्वाभिषेकं च कारयेत् ।
ब्रह्मणान् भोजयेत् पश्चादेवं शान्तिमवाप्नुयात् ॥ १८॥अर्थ: फिर स्विष्टकृत् आहुति देकर अभिषेक करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएँ — इस प्रकार शांति प्राप्त होती है।
कैसे पता करें?
संक्रांति एक क्षण है, पर परंपरा में उसके आसपास का कुछ समय (पुण्यकाल) विशेष माना जाता है। अपने जन्म के दिन सूर्य ने राशि बदली थी या नहीं, और कितने समय पहले या बाद — यह सटीक सूर्य-स्पष्ट से ही पता चलता है। जन्म कुंडली में सूर्य 0° या 29° के बहुत निकट हो तो जाँच करें।
अपनी जन्म कुंडली में सूर्य के सटीक अंश मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें।
पूछे जाने वाले प्रश्न
संक्रांति क्या है?
सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश। साल में बारह संक्रांतियाँ होती हैं।
खरमास कब होता है?
परंपरा में जब सूर्य धनु और मीन राशि में होता है — लगभग एक-एक महीना। यह नियम मुहूर्त परंपरा का है, बृहत्पाराशर होराशास्त्र का नहीं।
मलमास या अधिक मास क्यों आता है?
जब किसी पूरे चंद्र मास में सूर्य राशि नहीं बदलता, यानी उसमें कोई संक्रांति नहीं होती। यह लगभग हर 32–33 महीने में आता है।
संक्रांति में जन्म की शांति कैसे करें?
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (90.3–18) के अनुसार नवग्रह यज्ञ, संक्रांति-सूर्य-चंद्र की प्रतिमा-पूजा, मृत्युंजय मंत्र का जप और हवन, अभिषेक और ब्राह्मण भोजन।