नीचभंग राजयोग — नीच ग्रह कब बलवान बनता है?
संक्षेप में
नीचभंग का अर्थ है नीच राशि में बैठे ग्रह के दोष का भंग होना। प्रचलित नियमों के अनुसार यदि नीच ग्रह की राशि का स्वामी या उस ग्रह की उच्च राशि का स्वामी लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो, तो नीचभंग होता है। ये नियम मुख्यतः फलदीपिका आदि ग्रंथों में मिलते हैं। नीचभंग से ग्रह का दोष घटता है, पर राजयोग तभी बनता है जब वह ग्रह शुभ भावों का स्वामी भी हो।
नीच ग्रह क्या है?
हर ग्रह की एक उच्च राशि (जहाँ वह सबसे बलवान होता है) और ठीक सातवीं नीच राशि (जहाँ सबसे दुर्बल) होती है:
- सूर्य — उच्च मेष, नीच तुला
- चंद्र — उच्च वृषभ, नीच वृश्चिक
- मंगल — उच्च मकर, नीच कर्क
- बुध — उच्च कन्या, नीच मीन
- गुरु — उच्च कर्क, नीच मकर
- शुक्र — उच्च मीन, नीच कन्या
- शनि — उच्च तुला, नीच मेष
नीच ग्रह अपने कारकत्व और जिन भावों का स्वामी है, उनके फल देने में कमज़ोर हो जाता है।
नीचभंग के प्रचलित नियम
नीचभंग के जो नियम आज सबसे अधिक बताए जाते हैं, वे मुख्यतः मंत्रेश्वर की फलदीपिका और बाद के ग्रंथों से आते हैं। बृहत्पाराशर होराशास्त्र में "नीचभंग" नाम से अलग अध्याय नहीं है। मुख्य नियम:
- नीच ग्रह जिस राशि में है, उसका स्वामी लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो।
- नीच ग्रह की उच्च राशि का स्वामी लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो।
- जो ग्रह उस राशि में उच्च होता है (जहाँ नीच ग्रह बैठा है), वह केंद्र में हो।
- नीच ग्रह अपनी राशि के स्वामी से दृष्ट हो।
- नीच ग्रह नवांश में अपनी उच्च राशि में हो।
उदाहरण: गुरु मकर में नीच है। मकर का स्वामी शनि है, और गुरु की उच्च राशि कर्क का स्वामी चंद्रमा है। यदि शनि या चंद्रमा लग्न से केंद्र में हो, तो गुरु का नीचभंग माना जाएगा।
सबसे बड़ी भ्रांति: नीचभंग = राजयोग?
नीचभंग का सीधा अर्थ है — दोष का कम होना। यह अपने आप राजयोग नहीं है। राजयोग तभी बनता है जब:
- वह ग्रह लग्न के लिए केंद्र या त्रिकोण का स्वामी हो,
- उसकी दशा जीवन के उपयोगी समय में आए,
- नवांश और अन्य वर्गों में भी वह ग्रह संभला हुआ हो।
अनुभव में देखा गया है कि नीचभंग वाले ग्रह की दशा का आरंभ कठिन होता है और फिर बड़ी उन्नति देता है — "संघर्ष से सफलता" का योग।
पराशर का संबंधित योग: त्रिक भावेश नीच हों
पराशर राजयोगाध्याय में एक रोचक योग देते हैं जो "नीच" से ही जुड़ा है — यदि छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी नीच हों, शत्रु राशि में हों या अस्त हों, और लग्नेश अपनी उच्च या अपनी राशि में होकर लग्न को देखे, तो राज्य मिलता है:
षष्ठाऽष्टमव्ययाधीशा नीचस्था रिपुभेऽस्थगाः ।
स्वोच्चस्वभगलग्नेशो लग्नं पश्यंश्च राज्यदः ॥ २०॥यानी कष्ट देने वाले भावों (6, 8, 12) के स्वामियों का कमज़ोर होना जातक के लिए शुभ है — यही विचार "विपरीत राजयोग" का आधार भी है।
अपनी कुंडली में जाँच कैसे करें?
- कौन-सा ग्रह नीच है, और वह किन भावों का स्वामी है?
- उसकी राशि और उच्च राशि के स्वामी कहाँ हैं — लग्न या चंद्रमा से केंद्र में?
- नवांश में वह ग्रह कहाँ है?
- उसकी दशा कब है?
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पूछे जाने वाले प्रश्न
नीचभंग राजयोग क्या है?
जब नीच राशि में बैठे ग्रह का दोष कुछ विशेष स्थितियों से भंग हो जाए — जैसे उसकी राशि का स्वामी या उच्च राशि का स्वामी लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो। यदि वह ग्रह शुभ भावों का स्वामी भी हो, तो यह राजयोग का फल देता है।
क्या हर नीचभंग राजयोग देता है?
नहीं। नीचभंग केवल दोष घटाता है। राजयोग तभी बनता है जब वह ग्रह केंद्र या त्रिकोण का स्वामी हो और उसकी दशा उपयोगी समय में आए।
नीचभंग के नियम किस ग्रंथ से हैं?
प्रचलित नियम मुख्यतः फलदीपिका और बाद के ग्रंथों से हैं। बृहत्पाराशर होराशास्त्र में नीचभंग पर अलग अध्याय नहीं है, पर राजयोगाध्याय (39.20) में त्रिक भावेशों के नीच होने का शुभ योग दिया गया है।
गुरु का नीचभंग कब होता है?
गुरु मकर में नीच है। यदि शनि (मकर का स्वामी) या चंद्रमा (गुरु की उच्च राशि कर्क का स्वामी) लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो, तो गुरु का नीचभंग माना जाता है।