महामृत्युंजय मंत्र और मारक दशा — बृहत्पाराशर होराशास्त्र में मारकेश और मृत्युंजय जप
संक्षेप में
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (44.2–3) के अनुसार आयु के भाव (तीसरे और आठवें) से बारहवें — यानी दूसरा और सातवाँ भाव — मारक स्थान हैं, और इनके स्वामी मारकेश। पराशर दशाफल अध्यायों में बार-बार कहते हैं कि जब दूसरे या सातवें भाव के स्वामी की दशा में देह-कष्ट हो, तो "तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत्" — उस दोष के निवारण के लिए मृत्युंजय मंत्र का जप करें (जैसे 52.3, 60.51)।
मारक भाव और मारकेश
तृतीयमष्टमस्थानमायुःस्थानां द्वयं द्विज ।
मारकं तद्व्ययस्थानं द्वितीयं सप्तमं तथा ॥ २॥तत्रापि सप्तमस्थानाद् द्वितीयं बलवत्तरम् ।
तयोरीशौ तत्र गताः पापिनस्तेन संयुताः ॥ ३॥अर्थ: तीसरा और आठवाँ भाव आयु के भाव हैं। उनसे बारहवें — यानी दूसरा और सातवाँ भाव — मारक स्थान हैं। इनमें सातवें से दूसरा (यानी लग्न से दूसरा भाव) अधिक बलवान मारक है। इन भावों के स्वामी, उनमें बैठे पाप ग्रह और उनसे युक्त पाप ग्रह — ये सब मारक कहलाते हैं।
ये खेटाः पापिनस्ते च सर्वे मारकसंज्ञकाः ।
तेषां दशाविपाकेषु सम्भवे निधनं नृणाम् ॥ ४॥अर्थ: इन मारक ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में, यदि आयु का योग पूरा हो रहा हो, तो जीवन पर संकट होता है।
मारक दशा से डरें नहीं — शर्तें समझें
पराशर स्वयं कहते हैं कि पहले आयु का प्रमाण (अल्प, मध्यम, पूर्ण) तय करें, फिर मारक देखें (44.5)। हर मारक दशा मृत्यु नहीं लाती — इसका अर्थ प्रायः स्वास्थ्य-कष्ट, संकट या बड़ी बाधा होता है। साथ ही:
सत्यपि स्वेन सम्बन्धे न हन्ति शुभभुक्तिषु ।
हन्ति सत्यप्यसम्बन्धे मारकः पापभुक्तिषु ॥ ८॥अर्थ: मारक का संबंध होते हुए भी वह शुभ ग्रहों की भुक्ति में नहीं मारता, और संबंध न होने पर भी पाप ग्रहों की भुक्ति में मार सकता है।
यानी निर्णय केवल "मारकेश की दशा" देखकर नहीं, अंतर्दशा, आयु-योग और पूरी कुंडली देखकर होता है। पराशर बालकों के लिए यह भी कहते हैं कि 20 वर्ष तक आयु का निश्चय नहीं किया जा सकता, और जप, होम और चिकित्सा से उनकी रक्षा करें (44.12–13)।
पराशर कहाँ मृत्युंजय जप बताते हैं
विंशोत्तरी अंतर्दशा फल के अध्यायों (52–60) में पराशर बार-बार एक ही उपाय देते हैं। उदाहरण के लिए सूर्य की दशा में:
नीचाद्यशुभराशिस्थो विपरीतं फलं दिशेत् ।
द्वितीयद्यूननाथेऽर्के त्वपमृत्युभयं वदेत् ॥ २॥तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत् ।
सूर्यप्रीतिकरीं शान्तिं कुर्यादारोग्यलब्धये ॥ ३॥अर्थ: सूर्य नीच आदि अशुभ राशि में हो तो विपरीत फल देता है; सूर्य दूसरे या सातवें भाव का स्वामी हो तो अकाल मृत्यु का भय कहें। उस दोष के निवारण के लिए मृत्युंजय जप करें और आरोग्य के लिए सूर्य की प्रसन्नता देने वाली शांति करें।
शुक्र की दशा के प्रसंग में:
द्वितीयसप्तमाधीशे देहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं महामृत्युञ्जयं चरेत् ॥ ५१॥अर्थ: (अंतर्दशानाथ) दूसरे या सातवें भाव का स्वामी हो तो देह-बाधा होगी; उस दोष के निवारण के लिए महामृत्युंजय करें।
केतु के प्रसंग में:
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।
महामृत्युञ्जयं जाप्यं सर्वोपद्रवनाशनम् ॥ ६०॥अर्थ: उस दोष के निवारण के लिए शिवसहस्रनाम का पाठ करें और महामृत्युंजय का जप करें, जो सब उपद्रवों का नाश करता है।
इसी तरह संक्रांति जन्म की शांति (90.13, 90.17) और अन्य शांतियों में भी मृत्युंजय मंत्र का जप और तिल-हवन बताया गया है।
महामृत्युंजय मंत्र
यह मंत्र ऋग्वेद (7.59.12) का है, जिसे "त्र्यम्बक मंत्र" भी कहते हैं:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
भावार्थ: हम तीन नेत्रों वाले, सुगंधित और पुष्टि बढ़ाने वाले शिव की उपासना करते हैं। जैसे पका हुआ ककड़ी का फल बेल से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, अमृत से नहीं।
जप कैसे करें
- पराशर संख्या "यथाशक्ति" कहते हैं — 1,008, 108 या 28 (90.14)।
- संकल्प के साथ, शिव-पूजन के बाद, रुद्राक्ष की माला से जप की परंपरा है।
- कठिन दशा में किसी योग्य आचार्य से अनुष्ठान करवाया जा सकता है।
- गंभीर रोग में मंत्र-जप चिकित्सा का साथी है, विकल्प नहीं — डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
अपनी कुंडली में दूसरे और सातवें भाव के स्वामी और आने वाली दशाएँ मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें।
पूछे जाने वाले प्रश्न
मारकेश किसे कहते हैं?
लग्न से दूसरे और सातवें भाव के स्वामी। बृहत्पाराशर होराशास्त्र (44.2–3) के अनुसार ये आयु भावों (3 और 8) से बारहवें हैं, इसलिए मारक हैं; इनमें दूसरा भाव अधिक बलवान मारक है।
क्या मारकेश की दशा में मृत्यु निश्चित है?
नहीं। पराशर (44.5, 44.8) पहले आयु का प्रमाण देखने और अंतर्दशा के शुभ-पाप होने पर विचार करने को कहते हैं। प्रायः इसका अर्थ स्वास्थ्य-कष्ट या संकट होता है।
पराशर महामृत्युंजय जप कब बताते हैं?
दशाफल अध्यायों में, जब अंतर्दशानाथ दूसरे या सातवें भाव का स्वामी हो या देह-कष्ट का योग हो — "तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत्" (जैसे 52.3, 60.51)।
महामृत्युंजय मंत्र कहाँ से है?
ऋग्वेद (7.59.12) से, जिसे त्र्यम्बक मंत्र भी कहते हैं।