केमद्रुम योग — चंद्रमा के अकेलेपन का योग, बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अनुसार
संक्षेप में
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (37.11–12) के अनुसार केमद्रुम योग तब बनता है जब चंद्रमा से दूसरे और बारहवें भाव में सूर्य को छोड़कर कोई ग्रह न हो। इसका फल बुद्धि-विद्या की कमी, दरिद्रता और विपत्ति बताया गया है। चंद्रमा से दूसरे भाव में ग्रह हो तो सुनफा, बारहवें में हो तो अनफा, और दोनों में हों तो दुरधरा योग बनता है, जो शुभ हैं।
केमद्रुम योग क्या है?
चंद्रमा मन का कारक है। ज्योतिष में माना जाता है कि चंद्रमा के दोनों ओर ग्रह हों तो मन को सहारा मिलता है, और दोनों ओर खाली हो तो चंद्रमा "अकेला" पड़ जाता है। इसी अकेलेपन का नाम केमद्रुम योग है। पराशर ने इसे चंद्रयोगाध्याय (अध्याय 37) में बताया है।
पहले तीन शुभ योग: सुनफा, अनफा, दुरधरा
चन्द्रात् स्वान्त्योभयस्थे हि ग्रहे सूर्यं बिना क्रमात् ।
सुनफाख्तोऽनफाख्यश्च योगो दुरधराह्वयः ॥ ७॥अर्थ: सूर्य को छोड़कर कोई ग्रह चंद्रमा से दूसरे भाव में हो तो सुनफा, बारहवें भाव में हो तो अनफा, और दोनों भावों में ग्रह हों तो दुरधरा योग बनता है।
पराशर इनके फल भी बताते हैं — सुनफा वाला अपने परिश्रम से धन कमाता है और बुद्धि, धन तथा ख्याति पाता है (37.8); अनफा वाला स्वस्थ, शीलवान और यशस्वी होता है (37.9); दुरधरा वाला सुख भोगने वाला, दानी और धन-वाहन से युक्त होता है:
उत्पन्नसुखभुग् दाता धनवाहनसंयुतः ।
सद्भृत्यो जायते नूनं जनो दुरधराभवः ॥ १०॥केमद्रुम योग की परिभाषा
चन्द्रादाद्यधनाऽन्त्यस्थो विना भानुं न चेद्ग्रहः ।
कश्चित् स्याद्वा विना चन्द्रं लग्नात् केन्द्रगतोऽथ वा ॥ ११॥योगः केमद्रुमो नाम तत्र जातोऽतिगर्हितः ।
बुद्धिविद्याविहीनश्च दरिद्रापत्तिसंयुतः ॥ १२॥अर्थ: चंद्रमा से दूसरे और बारहवें भाव में सूर्य को छोड़कर कोई ग्रह न हो, तो केमद्रुम योग बनता है। ऐसा जातक निंदित, बुद्धि और विद्या से हीन, दरिद्र और विपत्तियों से घिरा बताया गया है।
श्लोक 37.11 के दूसरे भाग में लग्न से केंद्र की बात भी है — "चंद्रमा को छोड़कर कोई ग्रह लग्न से केंद्र में हो"। टीकाकार इस पंक्ति को अलग-अलग ढंग से पढ़ते हैं, इसलिए परंपरा में लग्न या चंद्रमा से केंद्र में ग्रह होने को केमद्रुम का भंग माना जाता है।
ध्यान रखने की बातें:
- सूर्य की गिनती नहीं होती — चंद्रमा के पास केवल सूर्य हो तब भी केमद्रुम माना जाएगा।
- परंपरा में राहु-केतु को भी इस गिनती में नहीं लिया जाता।
- बात भावों की है, अंशों की नहीं — दूसरे या बारहवें भाव में कहीं भी ग्रह हो तो केमद्रुम नहीं बनता।
चंद्र योग इतने महत्वपूर्ण क्यों?
पराशर अध्याय के अंत में एक बड़ी बात कहते हैं:
अन्ययोगफलं हन्ति चन्द्रयोगो विशेषतः ।
स्वफलं प्रददातीति बुधो यत्नाद् विचिन्तयेत् ॥ १३॥अर्थ: चंद्र योग विशेष रूप से दूसरे योगों के फल को दबा देता है और अपना फल देता है, इसलिए विद्वान इसका सावधानी से विचार करें।
यानी केमद्रुम हो तो दूसरे शुभ योगों का फल भी पूरा नहीं मिलता, और सुनफा-अनफा-दुरधरा हों तो वे कुंडली को सहारा देते हैं।
केमद्रुम से डरने से पहले क्या देखें?
इसी अध्याय में पराशर चंद्रमा को बल देने वाली स्थितियाँ भी बताते हैं — दिन का जन्म हो और चंद्रमा अपने या अधिमित्र के नवांश में हो तथा गुरु उसे देखे, तो जातक धन और सुख से युक्त होता है:
स्वांशे वा स्वाधिमित्रांशे स्थितश्च दिवसे शशी ।
गुरुणा दृश्यते तत्र जातो धनसुखान्वितः ॥ २॥रात के जन्म में यही बात शुक्र की दृष्टि के लिए कही गई है (37.3)। इसलिए जाँचें:
- चंद्रमा पक्ष-बल में कैसा है — पूर्णिमा के निकट का चंद्रमा बलवान होता है।
- चंद्रमा पर गुरु या शुक्र की दृष्टि है या नहीं।
- लग्न या चंद्रमा से केंद्र में कोई ग्रह है या नहीं।
- चंद्रमा अपनी, उच्च या मित्र राशि में है या नीच में।
कई सफल लोगों की कुंडली में केमद्रुम योग मिलता है, क्योंकि ऊपर की बातें उसे कमज़ोर कर देती हैं। परंपरा में सोमवार का व्रत, शिव-आराधना और चंद्र मंत्र का जप उपाय के रूप में किए जाते हैं।
अपनी कुंडली में चंद्रमा के आसपास के भाव मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें।
पूछे जाने वाले प्रश्न
केमद्रुम योग कब बनता है?
जब चंद्रमा से दूसरे और बारहवें भाव में सूर्य को छोड़कर कोई ग्रह न हो (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 37.11–12)।
सुनफा, अनफा और दुरधरा योग क्या हैं?
चंद्रमा से दूसरे भाव में ग्रह हो तो सुनफा, बारहवें में हो तो अनफा, और दोनों में हों तो दुरधरा योग। तीनों शुभ माने गए हैं (37.7–10)।
क्या केमद्रुम योग का भंग होता है?
परंपरा में लग्न या चंद्रमा से केंद्र में ग्रह होना, चंद्रमा पर गुरु-शुक्र की दृष्टि और बलवान चंद्रमा इसे कमज़ोर करते हैं। पराशर (37.2–3) भी गुरु या शुक्र से दृष्ट चंद्रमा को धन-सुख देने वाला बताते हैं।
क्या चंद्रमा के पास राहु या सूर्य हो तो केमद्रुम टूटता है?
नहीं। पराशर सूर्य को गिनती से बाहर रखते हैं, और परंपरा में राहु-केतु को भी नहीं गिना जाता।