राजयोग व धनयोग

काहल, पर्वत, चामर, लक्ष्मी और पारिजात योग — बृहत्पाराशर होराशास्त्र के विविधयोगाध्याय से

लेखक: एस्ट्रो रामजी (Astro Raamji) · · 3 मिनट पढ़ें

काहल, लक्ष्मी और पारिजात योग

संक्षेप में

बृहत्पाराशर होराशास्त्र के विविधयोगाध्याय (36) के अनुसार चतुर्थेश और गुरु परस्पर केंद्र में हों और लग्नेश बलवान हो तो काहल योग (36.9); भाग्येश केंद्र में मूलत्रिकोण, स्वराशि या उच्च में हो और लग्नेश बलवान हो तो लक्ष्मी योग (36.27); और लग्नेश, उसकी राशि का स्वामी, उसकी राशि का स्वामी तथा उसका नवांशेश — सब केंद्र, त्रिकोण या उच्च में हों तो कल्पद्रुम या पारिजात योग (36.33–34) बनता है।

विविधयोगाध्याय

पराशर ने अध्याय 36 में गजकेसरी से लेकर दर्जनों योग बताए हैं। इनमें कुछ अपेक्षाकृत कम चर्चित पर बहुत उपयोगी योग हैं। लगभग सभी में एक साझा शर्त है — लग्नेश बलवान हो। लग्नेश निर्बल हो तो कोई भी योग पूरा फल नहीं देता।

पर्वत योग

सप्तमे चाऽष्टमे शुद्धे शुभग्रहयुतेऽथवा ।
केन्द्रेषु शुभयुक्तेषु योगः पर्वतसंज्ञकः ॥ ७॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 7
भाग्यवान् पर्वतोत्पन्नः वाग्मी दाता च शास्त्रवित् ।
हास्यप्रियो यशस्वी च तेजस्वी पुरनायकः ॥ ८॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 8

अर्थ: सातवाँ और आठवाँ भाव खाली (शुद्ध) हों या शुभ ग्रहों से युक्त हों, और केंद्र शुभ ग्रहों से युक्त हों, तो पर्वत योग। जातक भाग्यवान, वक्ता, दानी, शास्त्रज्ञ, विनोदी, यशस्वी, तेजस्वी और नगर का मुखिया होता है।

काहल योग

सुखेशेज्यौ मिथः केन्द्रगतौ बलिनि लग्नपे ।
काहलो वा स्वभोच्चस्थे सुखेशे कर्मपान्विते ॥ ९॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 9
ओजस्वी साहसी धूर्तश्चतुरङ्गबलान्वितः ।
यत्किञ्चिद् ग्रामनाथश्च काहले जायते नरः ॥ १०॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 10

अर्थ: चतुर्थेश और गुरु एक-दूसरे से केंद्र में हों और लग्नेश बलवान हो — या चतुर्थेश अपनी या उच्च राशि में दशमेश के साथ हो — तो काहल योग। जातक ओजस्वी, साहसी, चतुर, चतुरंगिणी सेना (बड़े संसाधन) से युक्त और कुछ गाँवों का स्वामी होता है।

चामर योग

लग्नेशे तुङ्गगे केन्द्रे गुरुदृष्टे तु चामरः ।
शुभद्वये विलग्ने वा नवमे दशमे मदे ॥ ११॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 11
राजा वा राजपुज्यो वा चिरजीवी च पण्डितः ।
वाग्मी सर्वकलाविद् वा चामरे जायते जनः ॥ १२॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 12

अर्थ: लग्नेश उच्च राशि में केंद्र में हो और गुरु उसे देखे — या दो शुभ ग्रह लग्न, नवम, दशम या सप्तम में हों — तो चामर योग। जातक राजा या राजपूज्य, दीर्घायु, विद्वान, वक्ता और सब कलाओं का जानकार होता है।

लक्ष्मी योग

केन्द्रे मूलत्रिकोणस्ते भाग्येशे वा स्वभोच्चगे ।
लग्नाधिपे बलाढ्ये च लक्ष्मीयोगः प्रकीर्त्यते ॥ २७॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 27
सुरूपो गुणवान् भूपो बहुपुत्रधनान्वितः ।
यशस्वी धर्मसम्पन्नो लक्ष्मीयोगे जनो भवेत् ॥ २८॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 28

अर्थ: भाग्येश (नवम भाव का स्वामी) केंद्र में मूलत्रिकोण, स्वराशि या उच्च राशि में हो, और लग्नेश बलवान हो, तो लक्ष्मी योग। जातक सुंदर, गुणी, राजा-तुल्य, अनेक पुत्रों और धन से युक्त, यशस्वी और धर्मात्मा होता है।

कल्पद्रुम / पारिजात योग

लग्नेशतद्गतर्क्षेशतद्गतर्क्षेशतदंशपाः ।
केन्द्रे कोणे स्वतुङ्गे वा योगः कल्पद्रुमो मतः ॥ ३३॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 33
सर्वैश्वर्ययुतो भूपो धर्मात्मा बलसंयुतः ।
युद्धप्रियो दयालुश्च पारिजाते नरो भवेत् ॥ ३४॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 34

अर्थ: लग्नेश; लग्नेश जिस राशि में है उसका स्वामी; वह स्वामी जिस राशि में है उसका स्वामी; और उसका नवांशेश — ये सब केंद्र, त्रिकोण या अपनी उच्च राशि में हों, तो यह योग बनता है। जातक सब ऐश्वर्यों से युक्त, राजा, धर्मात्मा, बलवान, युद्धप्रिय और दयालु होता है।

ध्यान दें — श्लोक 36.33 में इसका नाम कल्पद्रुम है और 36.34 में फल पारिजात नाम से कहा गया है। दोनों स्वर्ग के इच्छा-पूर्ति वृक्ष के नाम हैं, इसलिए परंपरा में यह योग दोनों नामों से जाना जाता है।

"पारिजात" शब्द पराशर ने एक और अर्थ में भी प्रयोग किया है — वर्ग-बल की श्रेणी, जब ग्रह दो वर्गों में अपनी उत्तम स्थिति में हो (6.45)। दोनों को अलग समझें।

अमृत योग के बारे में

कई लेखों में "अमृत योग" भी इन्हीं के साथ बताया जाता है, पर हमारे संस्कृत पाठ (sanskritdocuments.org, 97 अध्याय) में इस नाम का कोई योग नहीं मिलता। इसलिए हम उसे यहाँ शामिल नहीं कर रहे।

इन योगों को कैसे परखें?

  • पहले लग्नेश का बल देखें — लगभग हर योग इसकी शर्त रखता है।
  • योग बनाने वाले ग्रह अस्त, नीच या पाप-पीड़ित तो नहीं।
  • योग का फल प्रायः उसे बनाने वाले ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में मिलता है।
  • कई योग हों तो सबसे बलवान ग्रह वाला योग ही मुख्य फल देता है (27.38)।

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पूछे जाने वाले प्रश्न

काहल योग कैसे बनता है?

चतुर्थेश और गुरु परस्पर केंद्र में हों और लग्नेश बलवान हो, या चतुर्थेश स्वराशि या उच्च में दशमेश के साथ हो (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 36.9)।

लक्ष्मी योग कैसे बनता है?

भाग्येश केंद्र में मूलत्रिकोण, स्वराशि या उच्च में हो और लग्नेश बलवान हो (36.27)।

पारिजात योग और कल्पद्रुम योग में क्या अंतर है?

पराशर के पाठ में यह एक ही योग है — 36.33 में नाम कल्पद्रुम और 36.34 में फल पारिजात नाम से कहा गया है।

क्या अमृत योग बृहत्पाराशर होराशास्त्र में है?

हमारे संस्कृत पाठ (97 अध्याय) में इस नाम का योग नहीं मिलता।