चर दशा — राशियों की दशा कैसे निकालें, बृहत्पाराशर होराशास्त्र (46.155–167) के अनुसार
संक्षेप में
चर दशा ग्रहों की नहीं, राशियों की दशा है। बृहत्पाराशर होराशास्त्र (46.155) के अनुसार लग्न से बारहवें तक हर राशि की दशा होती है, और राशि से उसके स्वामी तक की गिनती से दशा के वर्ष निकलते हैं। मेष से तीन-तीन राशियों के समूह (पद) में विषम पद की राशियों के लिए गिनती सीधी और सम पद की राशियों के लिए उलटी होती है (46.156); स्वामी उच्च हो तो एक वर्ष जोड़ें और नीच हो तो एक वर्ष घटाएँ (46.165)।
चर दशा क्या है?
विंशोत्तरी दशा में ग्रहों की दशाएँ चलती हैं, जबकि चर दशा में राशियों की। यह जैमिनी पद्धति की सबसे प्रसिद्ध दशा है, और पराशर ने इसे दशाध्याय (46) में बताया है। हर राशि की दशा 1 से 12 वर्ष की होती है, और जीवन के बड़े मोड़ — विवाह, करियर, स्थान परिवर्तन — इसमें अक्सर साफ़ दिखते हैं।
मूल नियम
लग्नादिव्ययपर्यन्तं भानां चरदशां ब्रुवे ।
तस्मात् तदीशपर्यन्तं संख्यामत्र दशां विदुः ॥ १५५॥अर्थ: लग्न से बारहवें तक की राशियों की चर दशा बताता हूँ — राशि से उसके स्वामी तक जितनी गिनती हो, वही दशा का मान है।
मेषादित्रित्रिभैर्ज्ञेयं पदमोजपदे क्रमात् ।
दशाब्दानयने कार्या गणना व्युत्क्रमात् समे ॥ १५६॥अर्थ: मेष से तीन-तीन राशियों के "पद" बनते हैं। विषम पद की राशियों में दशा-वर्ष निकालने के लिए गिनती सीधी, और सम पद की राशियों में उलटी करें।
- विषम पद (सीधी गिनती): मेष, वृष, मिथुन और तुला, वृश्चिक, धनु।
- सम पद (उलटी गिनती): कर्क, सिंह, कन्या और मकर, कुंभ, मीन।
प्रचलित गणना में राशि से स्वामी तक की गिनती में से एक घटाया जाता है — यानी स्वामी अगली राशि में हो तो 1 वर्ष। स्वामी उसी राशि में हो तो दशा 12 वर्ष की मानी जाती है।
दो स्वामी वाली राशियाँ
वृश्चिकाधिपती द्वौ च केतुभौमौ स्मृतौ द्विज ।
शनिराहु च कुम्भस्य स्वामिनौ परिकीर्तितो ॥ १५७॥अर्थ: वृश्चिक के दो स्वामी — केतु और मंगल; कुंभ के दो स्वामी — शनि और राहु।
पराशर (46.158–163) इनका निर्णय भी देते हैं: दोनों स्वामी अपनी राशि में साथ हों तो 12 वर्ष; एक अपनी राशि में और दूसरा बाहर हो तो बाहर वाले से गिनें; दोनों बाहर हों तो बलवान से — और बल में ग्रह-सहित राशि ग्रह-रहित से बली, अधिक ग्रहों वाली कम से बली, फिर द्विस्वभाव, स्थिर और चर के क्रम से।
उच्च-नीच का संशोधन
उच्चखेटस्य सद्भावे वर्षमेकं च निक्षिपेत् ।
तथैव नीचखेटस्य वर्षमेकं विशोधयेत् ॥ १६५॥अर्थ: स्वामी उच्च राशि में हो तो दशा में एक वर्ष जोड़ें, और नीच राशि में हो तो एक वर्ष घटाएँ।
दशाओं का क्रम
क्रमादुत्क्रमतो वाऽपि धर्मभावपदक्रमात् ।
लग्नराशिं समारभ्य विज्ञश्चरदशां नयेत् ॥ १६७॥अर्थ: लग्न राशि से आरंभ करके, नवम भाव के पद के अनुसार, दशाएँ सीधे या उलटे क्रम में चलती हैं।
यानी पहली दशा लग्न राशि की होती है। लग्न से नवम राशि विषम पद में हो तो आगे की दशाएँ राशियों के सीधे क्रम में, और सम पद में हो तो उलटे क्रम में।
उदाहरण
लग्न मेष, मंगल सिंह में।
- मेष विषम पद में है, इसलिए गिनती सीधी: मेष (1), वृष (2), मिथुन (3), कर्क (4), सिंह (5)।
- 5 − 1 = 4 वर्ष मेष की दशा।
- मंगल सिंह में न उच्च है न नीच, इसलिए कोई संशोधन नहीं।
- मेष से नवम धनु है, जो विषम पद में है — इसलिए अगली दशा वृष की, फिर मिथुन की।
सावधानी
चर दशा की कुछ बारीकियों — जैसे एक घटाने का नियम, दो स्वामी वाली राशियों का बल, और दशा-क्रम — पर जैमिनी पद्धति के विद्वानों में मत-भेद है। इसलिए किसी एक सॉफ़्टवेयर का परिणाम अंतिम न मानें, और विंशोत्तरी दशा से मिलाकर देखें। विंशोत्तरी की गणना हमारे लेख विंशोत्तरी दशा में है।
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पूछे जाने वाले प्रश्न
चर दशा क्या है?
जैमिनी पद्धति की राशि दशा, जिसमें लग्न से शुरू करके हर राशि की 1 से 12 वर्ष की दशा चलती है (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 46.155)।
चर दशा के वर्ष कैसे निकालते हैं?
राशि से उसके स्वामी तक गिनें — विषम पद की राशियों में सीधी और सम पद में उलटी गिनती (46.156)। प्रचलित गणना में गिनती से एक घटाते हैं, और स्वामी उसी राशि में हो तो 12 वर्ष।
वृश्चिक और कुंभ के दो स्वामी कौन हैं?
पराशर (46.157) के अनुसार वृश्चिक के मंगल और केतु, और कुंभ के शनि और राहु।
उच्च या नीच स्वामी से दशा कैसे बदलती है?
स्वामी उच्च हो तो एक वर्ष जोड़ें, नीच हो तो एक वर्ष घटाएँ (46.165)।