दोष व शांति

ग्रहण दोष — ग्रहण काल में जन्म और उसकी शांति, बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अनुसार

लेखक: एस्ट्रो रामजी (Astro Raamji) · · 3 मिनट पढ़ें

ग्रहण दोष और शांति

संक्षेप में

बृहत्पाराशर होराशास्त्र (91.1) के अनुसार सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय जन्म हो तो रोग, कष्ट, दरिद्रता और मृत्यु-भय बताया गया है, और इसकी शांति के लिए उस नक्षत्र के स्वामी, सूर्य या चंद्र और राहु की प्रतिमा (क्रमशः सोना, चाँदी और सीसा) बनाकर पूजा, हवन और ब्राह्मण भोजन करने को कहा गया है। कुंडली में केवल सूर्य या चंद्र के साथ राहु-केतु होना पराशर का "ग्रहण जन्म" नहीं है।

"ग्रहण दोष" के दो अलग अर्थ

आज "ग्रहण दोष" दो अलग बातों के लिए कहा जाता है:

  • कुंडली का योग: जन्म कुंडली में सूर्य या चंद्रमा के साथ राहु या केतु की युति। इसे प्रचलित भाषा में "ग्रहण योग" कहते हैं।
  • ग्रहण काल में जन्म: जब जन्म वास्तव में सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय हुआ हो।

महर्षि पराशर ने दूसरी स्थिति के लिए एक पूरा अध्याय दिया है — ग्रहणजातशान्त्यध्याय (अध्याय 91)। पहली स्थिति — केवल युति — इस अध्याय का विषय नहीं है।

पराशर: ग्रहण में जन्म का फल

सूर्येन्दुग्रहणे काले येषां जन्म भवेद् द्विज ।
व्याधिः कष्टं च दारिद्र्यं तेषां मृत्युभयं भवेत् ॥ १॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 91 (ग्रहणजातशान्त्यध्यायः) · श्लोक 1

अर्थ: सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय जिनका जन्म हो, उन्हें रोग, कष्ट, दरिद्रता और मृत्यु का भय होता है।

अतः शान्तिं प्रवक्ष्यामि जनानां हितकाङ्क्षया ।
सूर्यस्येन्दोश्च ग्रहेणं यस्मिनृक्षे प्रजायते ॥ २॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 91 (ग्रहणजातशान्त्यध्यायः) · श्लोक 2

अर्थ: इसलिए लोगों के हित के लिए इसकी शांति बताता हूँ — ग्रहण जिस नक्षत्र में हो और उसी में जन्म हो...

शांति की विधि

तन्नक्षत्रपते रूपं सुवर्णेन प्रकल्पयेत् ।
सूर्यग्रहे सूर्यरूपं सुवर्णेन स्वशक्तितः ॥ ३॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 91 (ग्रहणजातशान्त्यध्यायः) · श्लोक 3
चन्द्रग्रहे चन्द्ररूपं रजतेन तथैव च ।
राहुरूपं प्रकुर्वीत सीसकेन विचक्षणः ॥ ४॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 91 (ग्रहणजातशान्त्यध्यायः) · श्लोक 4

अर्थ: उस नक्षत्र के स्वामी की प्रतिमा सोने से बनाएँ। सूर्य ग्रहण में सूर्य की प्रतिमा सामर्थ्य अनुसार सोने से, चंद्र ग्रहण में चंद्र की प्रतिमा चाँदी से, और राहु की प्रतिमा सीसे से बनाएँ।

अगले श्लोकों (91.5–13) में पराशर पूरी विधि बताते हैं:

  • पवित्र स्थान को गोबर से लीपकर नया वस्त्र बिछाएँ और तीनों प्रतिमाएँ स्थापित करें।
  • सूर्य ग्रहण में लाल अक्षत, लाल गंध, लाल पुष्प-वस्त्र; चंद्र ग्रहण में श्वेत गंध, श्वेत पुष्प-वस्त्र; राहु को काले पुष्प-वस्त्र अर्पित करें।
  • सूर्य की पूजा "आकृष्णेन" मंत्र से, चंद्र की "इमं देवा" मंत्र से, और राहु की दूर्वा से "कया न" मंत्र से करें।
  • सूर्य के लिए आक, चंद्र के लिए पलाश और राहु के लिए दूर्वा की समिधा से हवन करें।
  • जातक का कलश के जल से अभिषेक करें, आचार्य की पूजा करें और सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएँ।
एवं ग्रहणजातस्य शान्तिं कृत्वा विधानतः ।
सर्वविघ्नं विनिर्जित्वा सौभाग्यं लभते नरः ॥ १४॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 91 (ग्रहणजातशान्त्यध्यायः) · श्लोक 14

अर्थ: इस प्रकार ग्रहण-जात की विधिपूर्वक शांति करने से सब विघ्न दूर होते हैं और मनुष्य सौभाग्य पाता है।

कुंडली में सूर्य-राहु या चंद्र-राहु युति का क्या?

यदि जन्म ग्रहण के समय नहीं हुआ, पर कुंडली में सूर्य या चंद्रमा के साथ राहु-केतु हैं, तो उसे पराशर के नियम से भाव और दशा देखकर परखें। पराशर राहु-केतु के लिए कहते हैं कि वे जिस भाव और भावेश के साथ होते हैं उसी का फल देते हैं (34.16)। ऐसी युति में:

  • युति किस भाव में है और सूर्य या चंद्रमा किस भाव के स्वामी हैं।
  • सूर्य या चंद्रमा का अपना बल — स्वराशि, उच्च या नीच।
  • गुरु की दृष्टि है या नहीं।
  • राहु, सूर्य या चंद्रमा की दशा कब आएगी।

पीड़ा वास्तव में दिखे तो ग्रहशांति अध्याय (84) के अनुसार उस ग्रह का जप और दान किया जाता है।

कैसे पता करें कि जन्म ग्रहण में हुआ?

ग्रहण वर्ष में कुछ ही बार होते हैं और हर जगह दिखते भी नहीं। अपनी जन्म तिथि का पंचांग देखें — सूर्य ग्रहण केवल अमावस्या और चंद्र ग्रहण केवल पूर्णिमा को होता है। अमावस्या में जन्म की शांति पराशर ने अलग अध्याय (86) में दी है।

अपनी जन्म तिथि, नक्षत्र और राहु-केतु की स्थिति मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें।

पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्रहण दोष क्या है?

शास्त्र में मूल रूप से यह ग्रहण काल में जन्म है। बृहत्पाराशर होराशास्त्र (91.1) के अनुसार ऐसे जन्म में रोग, कष्ट, दरिद्रता और मृत्यु-भय बताया गया है। आज सूर्य या चंद्र के साथ राहु-केतु की युति को भी ग्रहण दोष कहा जाता है।

ग्रहण में जन्म की शांति कैसे करें?

पराशर (91.3–14) के अनुसार नक्षत्र स्वामी की सोने की, सूर्य (सोना) या चंद्र (चाँदी) की और राहु (सीसा) की प्रतिमा बनाकर पूजा, हवन, अभिषेक और ब्राह्मण भोजन करें।

क्या सूर्य-राहु युति ही ग्रहण दोष है?

पराशर का ग्रहणजात अध्याय वास्तविक ग्रहण काल के जन्म के लिए है। केवल युति का फल भाव, बल और दशा देखकर तय होता है।

सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण किस तिथि को होते हैं?

सूर्य ग्रहण केवल अमावस्या को और चंद्र ग्रहण केवल पूर्णिमा को होता है।