ग्रह शांति और दान — जप संख्या, समिधा, दक्षिणा और सही नियम (बृहत्पाराशर होराशास्त्र अध्याय 84)
संक्षेप में
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (84.26) के अनुसार जो ग्रह जिस समय कुंडली में अशुभ स्थिति में हो, उसी की यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए। जप संख्या (84.19–20): सूर्य 7,000, चंद्र 11,000, मंगल 10,000, बुध 9,000, गुरु 19,000, शुक्र 16,000, शनि 23,000, राहु 18,000 और केतु 17,000। दक्षिणा (84.25): सूर्य को गाय, चंद्र को शंख, मंगल को बैल, बुध को सोना, गुरु को वस्त्र, शुक्र को घोड़ा, शनि को काली गाय, राहु को लोहा और केतु को बकरा।
ग्रह शांति क्यों?
पराशर ग्रहशान्त्यध्याय (84) की शुरुआत इस कारण से करते हैं:
ग्रहा सूर्यादयः पूर्वं मया प्रोक्ता द्विजोत्तम ।
जगत्यां सर्वजन्तूनां तदधीनं सुखाऽसुखम् ॥ २॥तस्मात् सुशान्तिकामो वा श्रीकामो वा सुचेतसा ।
वृष्टायायुः पुष्टिकामो वा तेषां यज्ञं समाचरेत् ॥ ३॥अर्थ: संसार के सब प्राणियों का सुख-दुःख ग्रहों के अधीन है। इसलिए शांति, लक्ष्मी, वर्षा, आयु या पुष्टि चाहने वाला व्यक्ति शुद्ध मन से ग्रहों का यज्ञ करे।
किस ग्रह की शांति करें?
यस्य यश्च यदा दुःस्थः स तं यत्नेन पूजयेत् ।
एषां धात्रा वरो दत्तः पूजिताः पूजयिष्यथ ॥ २६॥अर्थ: जिसका जो ग्रह जब दुःस्थान में हो (अशुभ फल दे रहा हो), वह उसकी यत्नपूर्वक पूजा करे। ब्रह्मा ने ग्रहों को वर दिया है कि पूजे जाने पर वे पूजक का सम्मान करेंगे।
यानी शांति सभी ग्रहों की एक साथ ज़रूरी नहीं — उस ग्रह की करें जो कुंडली या दशा में वास्तव में पीड़ा दे रहा है।
प्रतिमा की धातु
ताभ्राच्च स्फटिकाद्रक्तचन्दनात् स्वर्णकादुभौ ।
रजतादयसः सीसात् कांस्यात् कार्याः क्रामद् ग्रहाः ॥ ४॥अर्थ: क्रम से सूर्य की प्रतिमा ताँबे की, चंद्र की स्फटिक की, मंगल की लाल चंदन की, बुध और गुरु दोनों की सोने की, शुक्र की चाँदी की, शनि की लोहे की, राहु की सीसे की और केतु की काँसे की बनाएँ। या उनके रंगों से वस्त्र पर चित्र बनाएँ (84.5)।
जप संख्या
सप्त रुद्रा दिशो नन्दा नवचन्द्रा नृपास्तथा ।
त्रिपक्षा अष्टचन्द्राश्च सप्तचन्द्रास्तथैव च ॥ १९॥इमाः संख्याः सहस्रघ्ना जपसंख्याः प्रकीर्तिताः ।
क्रमादर्कादिखेटानां प्रीत्यर्थं द्विजपुङ्गव ॥ २०॥अर्थ: इन संख्याओं को हज़ार से गुणा करें — यही सूर्य आदि ग्रहों की प्रसन्नता के लिए जप संख्या है:
- सूर्य: 7,000
- चंद्र: 11,000
- मंगल: 10,000
- बुध: 9,000
- गुरु: 19,000
- शुक्र: 16,000
- शनि: 23,000
- राहु: 18,000
- केतु: 17,000
श्लोक में संख्याएँ शब्दों में हैं — जैसे "रुद्र" = 11, "दिशा" = 10, "नन्दा" = 9, "नृप" = 16, "त्रिपक्ष" = 23।
हवन की समिधा
अर्कः पलाशः खदिरस्त्वपामार्गस्तु पिप्पलः ।
उदुम्बरः शमी दुर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात् ॥ २१॥अर्थ: क्रम से सूर्य के लिए आक, चंद्र के लिए पलाश, मंगल के लिए खैर, बुध के लिए अपामार्ग (चिरचिटा), गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए गूलर, शनि के लिए शमी, राहु के लिए दूर्वा और केतु के लिए कुश। हर ग्रह के लिए 108 या 28 आहुतियाँ, शहद, घी, दही या दूध के साथ (84.22)।
ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा
धेनुः शङ्खस्तथाऽनड्वान् हेम वासो हयः क्रमात् ।
कृष्णा गौरायसं छाग एता रव्यादिदक्षिणाः ॥ २५॥अर्थ: सूर्य से केतु तक की दक्षिणा क्रम से — गाय, शंख, बैल, सोना, वस्त्र, घोड़ा, काली गाय, लोहा और बकरा।
भोजन (84.23–24) भी क्रम से बताया गया है — जैसे सूर्य के लिए गुड़-भात, चंद्र के लिए खीर — और सामर्थ्य अनुसार सम्मानपूर्वक देने को कहा गया है।
"गलत दान" की धारणा
प्रचलित मान्यता है कि उच्च या शुभ ग्रह की वस्तुएँ दान करने से वह ग्रह कमज़ोर हो जाता है। यह नियम पराशर के इस अध्याय में नहीं है। पराशर का नियम सरल है — जो ग्रह दुःस्थ हो, उसकी पूजा करें (84.26)। इसलिए दान से पहले यह तय करें कि कौन सा ग्रह वास्तव में पीड़ा दे रहा है, और सामर्थ्य से अधिक खर्च न करें — पराशर स्वयं बार-बार "यथाशक्ति" कहते हैं।
मानवानां ग्रहाधीना उञ्छ्रायाः पतनानि च ।
भावाऽभावौ च जगतां तस्मात् पूज्यतमा ग्रहाः ॥ २७॥अर्थ: मनुष्यों का उत्थान और पतन, और संसार का होना-न-होना ग्रहों के अधीन है; इसलिए ग्रह अत्यंत पूज्य हैं।
कौन सा ग्रह इस समय पीड़ा दे रहा है, यह दशा और गोचर से मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें, या व्यक्तिगत परामर्श लें।
पूछे जाने वाले प्रश्न
किस ग्रह की शांति करनी चाहिए?
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (84.26) के अनुसार जो ग्रह जिस समय दुःस्थ हो — यानी कुंडली या दशा में अशुभ फल दे रहा हो — उसी की यत्नपूर्वक पूजा करें।
नवग्रहों की जप संख्या कितनी है?
सूर्य 7,000, चंद्र 11,000, मंगल 10,000, बुध 9,000, गुरु 19,000, शुक्र 16,000, शनि 23,000, राहु 18,000 और केतु 17,000 (84.19–20)।
नवग्रहों की समिधा कौन सी है?
सूर्य आक, चंद्र पलाश, मंगल खैर, बुध अपामार्ग, गुरु पीपल, शुक्र गूलर, शनि शमी, राहु दूर्वा और केतु कुश (84.21)।
क्या गलत दान से ग्रह कमज़ोर होता है?
यह प्रचलित मान्यता है, पराशर के ग्रहशांति अध्याय में यह नियम नहीं है। पराशर दुःस्थ ग्रह की पूजा और यथाशक्ति दान कहते हैं।