गंडांत जन्म — तीनों प्रकार के गंडांत और उनकी शांति, बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अनुसार
संक्षेप में
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (92.1–4) के अनुसार गंडांत तीन प्रकार का है — तिथि गंडांत (पूर्णा 5, 10, 15 और नंदा 1, 6, 11 तिथियों की संधि), नक्षत्र गंडांत (रेवती-अश्विनी, आश्लेषा-मघा, ज्येष्ठा-मूल की संधि) और लग्न गंडांत (मीन-मेष, कर्क-सिंह, वृश्चिक-धनु की संधि)। इसकी शांति के लिए तिथि गंडांत में बैल, नक्षत्र गंडांत में गाय और लग्न गंडांत में सोने का दान बताया गया है (92.7–8)।
गंडांत क्या है?
"गंड" यानी गाँठ और "अंत" यानी छोर। जहाँ एक तिथि, नक्षत्र या राशि खत्म होकर अगली शुरू होती है, उस संधि को गंडांत कहते हैं। ज्योतिष में विशेष रूप से वे संधियाँ गंडांत मानी जाती हैं जहाँ जल तत्व की राशि खत्म होकर अग्नि तत्व की राशि शुरू होती है। महर्षि पराशर ने इस पर गण्डान्तजातशान्त्यध्याय (अध्याय 92) दिया है।
तीन प्रकार का गंडांत
तिथिनक्षत्रलग्नानां गण्डान्तं त्रिविधं स्मृतम् ।
जन्मयात्राविवाहादौ भवेत्तन्निधनप्रदम् ॥ १॥अर्थ: तिथि, नक्षत्र और लग्न का गंडांत तीन प्रकार का बताया गया है, जो जन्म, यात्रा और विवाह आदि में अशुभ होता है।
1. तिथि गंडांत:
पूर्णानन्दाख्ययोस्तिथ्योः सन्धौ नाडीचतुष्टयम् ।
अध ऊर्ध्वं च मैत्रेय तिथिगण्डान्तमुच्यते ॥ २॥पूर्णा तिथियों (पंचमी, दशमी, पूर्णिमा/अमावस्या) और नंदा तिथियों (प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी) की संधि पर चार नाड़ी (घटी) का समय तिथि गंडांत है।
2. नक्षत्र गंडांत:
रेवतीदास्रयोः साप्रमघयोः शाक्रमूलयोः ।
सन्धौ नक्षत्रगण्डान्तमेवं नाडीचतुष्टयम् ॥ ३॥रेवती-अश्विनी, आश्लेषा-मघा और ज्येष्ठा-मूल की संधि पर — यही नक्षत्र गंडांत है। ध्यान दें कि ये तीनों संधियाँ ठीक मीन-मेष, कर्क-सिंह और वृश्चिक-धनु की राशि-संधियों पर पड़ती हैं।
3. लग्न गंडांत:
मीनाजयोः कर्किहर्योर्लग्नयोरलिचापयोः ।
सन्धौ च लग्नगण्डान्तमधौर्ध्व घटीमितम् ॥ ४॥मीन-मेष, कर्क-सिंह और वृश्चिक-धनु लग्नों की संधि पर — लग्न गंडांत।
अभुक्त मूल
एषु चाभुक्तमूलाख्यं महाविघ्नपदं स्मृतम् ।
इन्द्रराक्षसयोः सन्धौ पञ्चाष्टघटिकाः क्रमात् ॥ ५॥अर्थ: इनमें "अभुक्त मूल" नाम का समय सबसे बड़ा विघ्न माना गया है — ज्येष्ठा (इंद्र देवता) और मूल (राक्षस/निर्ऋति देवता) की संधि पर क्रमशः पाँच और आठ घटी। एक घटी लगभग 24 मिनट की होती है, यानी ज्येष्ठा के अंतिम लगभग 2 घंटे और मूल के पहले लगभग सवा तीन घंटे। पराशर ने इसकी अलग शांति अध्याय 93 में दी है।
गंडांत जन्म की शांति
अथ गण्डान्तजातस्य शिशोः शान्तिविधिं ब्रुवे ।
गण्डान्तकालजातस्य सूतकान्त्यदिने पिता ॥ ६॥शान्तिंशुभेऽह्नि वा कुर्यात् पश्येत् तावन्न तं शिशुम् ।
वृषभं तिथिगण्डान्ते नक्षत्रे धनुमेव च ॥ ७॥काञ्चनं लग्नगण्डान्ते दद्यात्तद्दोषप्रशान्तये ।
आद्यभागे प्रजातस्य पितुश्चाप्यभिषेचनम् ॥ ८॥अर्थ: गंडांत में जन्मे शिशु की शांति पिता सूतक के अंतिम दिन या किसी शुभ दिन करें, और तब तक शिशु का मुख न देखें। तिथि गंडांत में बैल, नक्षत्र गंडांत में गाय और लग्न गंडांत में सोने का दान दोष की शांति के लिए करें। गंडांत के पहले भाग में जन्म हो तो पिता का और दूसरे भाग में हो तो माता का अभिषेक करवाएँ (92.8–9)।
विधि के अंत में पराशर फल बताते हैं:
ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चादेवं दोषात्प्रमुच्यते ।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं सम्प्राप्नोति दिने दिने ॥ ११॥अर्थ: फिर ब्राह्मणों को भोजन कराएँ — इस प्रकार दोष से मुक्ति मिलती है और आयु, आरोग्य और ऐश्वर्य दिन-प्रतिदिन बढ़ते हैं।
डरने के बजाय सही जाँच
- गंडांत केवल संधि के आसपास का छोटा समय है, पूरा नक्षत्र नहीं — जैसे पूरा अश्विनी या मूल नक्षत्र गंडांत नहीं होता।
- सटीक निर्णय के लिए जन्म समय और चंद्रमा का सटीक स्पष्ट ज़रूरी है — कुछ मिनट का अंतर भी गंडांत में होने या न होने का फर्क कर देता है।
- पराशर स्वयं शांति का स्पष्ट उपाय देते हैं और उसके बाद आयु-आरोग्य की वृद्धि बताते हैं।
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पूछे जाने वाले प्रश्न
गंडांत कितने प्रकार का होता है?
तीन — तिथि गंडांत, नक्षत्र गंडांत और लग्न गंडांत (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 92.1)।
गंडांत नक्षत्र कौन से हैं?
रेवती-अश्विनी, आश्लेषा-मघा और ज्येष्ठा-मूल की संधि (92.3)। गंडांत संधि के आसपास का छोटा समय है, पूरा नक्षत्र नहीं।
अभुक्त मूल क्या है?
ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र की संधि पर क्रमशः पाँच और आठ घटी का समय, जिसे पराशर (92.5) ने सबसे बड़ा विघ्न बताया है।
गंडांत जन्म की शांति कैसे करें?
पराशर (92.6–11) के अनुसार सूतक के अंत या शुभ दिन शांति करें; तिथि गंडांत में बैल, नक्षत्र गंडांत में गाय और लग्न गंडांत में सोने का दान, अभिषेक, हवन और ब्राह्मण भोजन।