राजयोग व धनयोग

गजकेसरी योग — बृहत्पाराशर होराशास्त्र की असली शर्तें

लेखक: एस्ट्रो रामजी (Astro Raamji) · · 3 मिनट पढ़ें

गजकेसरी योग

संक्षेप में

बृहत्पाराशर होराशास्त्र (36.3) के अनुसार गजकेसरी योग तब बनता है जब गुरु लग्न या चंद्रमा से केंद्र (1, 4, 7, 10वें भाव) में हो, शुभ ग्रहों से दृष्ट या युक्त हो, और नीच, अस्त या शत्रु राशि में न हो। ऐसा जातक तेजस्वी, धनवान, मेधावी, गुणी और राजा का प्रिय होता है। केवल "चंद्र से केंद्र में गुरु" देखकर यह योग मान लेना अधूरी बात है।

गजकेसरी योग क्या है?

"गज" यानी हाथी और "केसरी" यानी सिंह — यह योग शक्ति और प्रतिष्ठा का प्रतीक है। यह वैदिक ज्योतिष के सबसे प्रसिद्ध योगों में से एक है, और इसी कारण सबसे अधिक गलत ढंग से भी बताया जाता है।

मूल श्लोक और तीन शर्तें

महर्षि पराशर विविधयोगाध्याय में कहते हैं:

केन्द्रे देवगुरौ लग्नाच्चन्द्राद्वा शुभदृग्युते ।
नीचास्तारिगृहैर्हीने योगोऽयं गजकेसरी ॥ ३॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 3

इस श्लोक में तीन शर्तें हैं:

  • स्थिति: गुरु लग्न से या चंद्रमा से केंद्र (1, 4, 7, 10वें भाव) में हो।
  • शुभ संबंध: गुरु शुभ ग्रहों से दृष्ट या युक्त हो ("शुभदृग्युते")।
  • दोष-रहित: गुरु नीच राशि (मकर) में न हो, अस्त न हो और शत्रु राशि में न हो ("नीचास्तारिगृहैर्हीने")।

योग का फल

गजकेसरीसञ्जातस्तेजस्वी धनवान् भवेत् ।
मेधावी गुणसम्पन्नो राजप्रियकरो नरः ॥ ४॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 4

अर्थ: गजकेसरी योग में जन्मा व्यक्ति तेजस्वी, धनवान, बुद्धिमान, गुणों से युक्त और शासन/उच्च पदों पर बैठे लोगों का प्रिय होता है।

गलतफ़हमी: हर दूसरी कुंडली में गजकेसरी?

गुरु चंद्रमा से केंद्र में होने की संभावना लगभग एक-तिहाई होती है — यानी केवल स्थिति देखें तो लगभग हर तीसरी कुंडली में "गजकेसरी" बन जाएगा। पर पराशर की बाकी दो शर्तें जोड़ते ही यह संख्या बहुत कम हो जाती है। इसलिए:

  • गुरु मकर राशि में (नीच) हो तो योग नहीं माना जाएगा, जब तक नीचभंग न हो।
  • गुरु सूर्य के बहुत निकट (अस्त) हो तो योग का फल क्षीण हो जाता है।
  • गुरु शत्रु राशि (बुध या शुक्र की राशि) में हो तो योग निर्बल रहता है।
  • गुरु पर शुभ दृष्टि न हो और केवल पाप ग्रहों का प्रभाव हो, तो फल अधूरा मिलता है।

फल कब मिलता है?

कोई भी योग अपना पूरा फल प्रायः उन ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में देता है जो योग बना रहे हैं। गजकेसरी के लिए गुरु और चंद्रमा की दशाएँ सबसे महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा:

  • गुरु किन भावों का स्वामी है — लग्न के लिए त्रिकोण या केंद्र का स्वामी हो तो फल बढ़ता है।
  • नवांश (D9) में गुरु और चंद्रमा की स्थिति अच्छी हो तो योग स्थायी फल देता है।
  • चंद्रमा का पक्ष-बल — शुक्ल पक्ष का बलवान चंद्रमा योग को मज़बूत करता है।

इसी अध्याय के अन्य योग

इसी अध्याय में पराशर अमलकीर्ति योग भी बताते हैं — लग्न या चंद्र से दसवें भाव में केवल शुभ ग्रह हों तो चंद्र-तारों तक रहने वाली कीर्ति मिलती है:

दशमेऽङ्गात्तथा चन्द्रात् केवलैश्च शुभैर्युते ।
स योगोऽमलकीत्र्त्याख्यः कीर्तिराचन्द्रतारकी ॥ ५॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 36 (विविधयोगाध्यायः) · श्लोक 5

अपनी कुंडली में गुरु और चंद्रमा की स्थिति, नीच-अस्त की जाँच और दशाएँ मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें।

पूछे जाने वाले प्रश्न

गजकेसरी योग कैसे बनता है?

जब गुरु लग्न या चंद्रमा से केंद्र (1, 4, 7, 10) में हो, शुभ ग्रहों से दृष्ट या युक्त हो, और नीच, अस्त या शत्रु राशि में न हो (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 36.3)।

गजकेसरी योग का फल क्या है?

पराशर (36.4) के अनुसार जातक तेजस्वी, धनवान, मेधावी, गुणी और उच्च पदस्थ लोगों का प्रिय होता है।

क्या चंद्र से केंद्र में गुरु होना ही गजकेसरी योग है?

नहीं। यह केवल पहली शर्त है। गुरु पर शुभ दृष्टि होनी चाहिए और वह नीच, अस्त या शत्रु राशि में नहीं होना चाहिए।

गजकेसरी योग का फल कब मिलता है?

मुख्यतः गुरु और चंद्रमा की महादशा-अंतर्दशा में, और तब अधिक जब गुरु लग्न के लिए शुभ भावों का स्वामी हो।