दोष व शांति

दशरथ कृत शनि स्तोत्र — कथा, कब और कैसे पढ़ें, और बृहत्पाराशर होराशास्त्र की शनि शांति

लेखक: एस्ट्रो रामजी (Astro Raamji) · · 3 मिनट पढ़ें

दशरथ कृत शनि स्तोत्र

संक्षेप में

दशरथ कृत शनि स्तोत्र पद्म पुराण से जुड़ी कथा में राजा दशरथ द्वारा की गई शनि देव की स्तुति है, जिसे परंपरा में साढ़े साती और ढैया की पीड़ा कम करने के लिए शनिवार को पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र बृहत्पाराशर होराशास्त्र का भाग नहीं है। पराशर की शनि शांति (84.11–25) में शनि की प्रतिमा लोहे की, जप 23,000, समिधा शमी, और दक्षिणा काली गाय बताई गई है।

स्तोत्र की कथा

परंपरा में प्रचलित कथा (जो पद्म पुराण से जोड़ी जाती है) के अनुसार, अयोध्या के राजा दशरथ के समय ज्योतिषियों ने बताया कि शनि रोहिणी नक्षत्र का भेदन करने वाले हैं — "रोहिणी शकट भेद" — जिससे लंबा अकाल पड़ेगा। प्रजा की रक्षा के लिए दशरथ स्वयं शनि के सामने पहुँचे। उनके साहस और प्रजा-प्रेम से प्रसन्न होकर शनि ने वर माँगने को कहा। दशरथ ने वर माँगा कि शनि रोहिणी का भेदन न करें, और फिर एक स्तुति की। शनि ने कहा कि जो इस स्तुति का पाठ करेगा, उसे वे पीड़ा नहीं देंगे।

यही स्तुति दशरथ कृत शनि स्तोत्र कहलाती है। इसकी शुरुआत "नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च" से होती है।

क्या यह बृहत्पाराशर होराशास्त्र में है?

नहीं। यह स्तोत्र पौराणिक परंपरा का है, बृहत्पाराशर होराशास्त्र का भाग नहीं। पर पराशर ने ग्रहशांति अध्याय (84) में शनि की पूजा की शास्त्रीय विधि दी है, जिसके साथ स्तोत्र-पाठ किया जा सकता है।

पराशर की शनि शांति

शनि का स्वरूप (ध्यान):

इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः ।
वाणवाणासनधरो विज्ञेयोऽर्कसुतो द्विज ॥ ११॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 84 (ग्रहशान्त्यध्यायः) · श्लोक 11

अर्थ: शनि इंद्रनील मणि जैसी कांति वाले, शूलधारी, वर देने वाले, गिद्ध पर सवार, और बाण-धनुष धारण किए हुए हैं — सूर्य के पुत्र के रूप में इनका ध्यान करें।

प्रतिमा, जप, समिधा और दक्षिणा:

  • प्रतिमा: लोहे की (84.4)।
  • जप: 23,000 (84.19–20) — "त्रिपक्षा" = 23।
  • मंत्र: "शन्नो देवीरभीष्टये" (84.18)।
  • समिधा: शमी (84.21)।
  • दक्षिणा: काली गाय (84.25)।
यस्य यश्च यदा दुःस्थः स तं यत्नेन पूजयेत् ।
एषां धात्रा वरो दत्तः पूजिताः पूजयिष्यथ ॥ २६॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 84 (ग्रहशान्त्यध्यायः) · श्लोक 26

अर्थ: जिसका जो ग्रह जब दुःस्थ हो, वह उसकी यत्नपूर्वक पूजा करे।

स्तोत्र पाठ कब और कैसे

  • कब: शनिवार को, विशेषकर साढ़े साती, ढैया (शनि का चंद्रमा से चौथे या आठवें भाव में गोचर), या शनि की महादशा-अंतर्दशा में।
  • कैसे: स्नान के बाद, पश्चिम या दक्षिण की ओर मुख करके, सरसों के तेल का दीपक जलाकर। परंपरा में पीपल के नीचे पाठ भी शुभ माना जाता है।
  • संख्या: श्रद्धा और समय के अनुसार — एक, तीन या ग्यारह पाठ।
  • साथ में: निर्धन, श्रमिक और बुज़ुर्गों की सेवा — शनि सेवक और श्रम का कारक है (3.15)।

डर नहीं, अनुशासन

शनि दंड नहीं, कर्मों का हिसाब देता है। साढ़े साती हर किसी के लिए एक जैसी नहीं होती — जन्म कुंडली में शनि का स्वामित्व, बल और अष्टकवर्ग के अंक इसका फल तय करते हैं। विस्तार हमारे लेख शनि की साढ़े साती और अष्टकवर्ग में है।

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पूछे जाने वाले प्रश्न

दशरथ कृत शनि स्तोत्र क्या है?

राजा दशरथ द्वारा की गई शनि देव की स्तुति, जिसकी कथा पद्म पुराण से जोड़ी जाती है। परंपरा में इसे शनि की पीड़ा कम करने के लिए पढ़ा जाता है।

क्या दशरथ शनि स्तोत्र बृहत्पाराशर होराशास्त्र में है?

नहीं, यह पौराणिक परंपरा का स्तोत्र है। पराशर ने ग्रहशांति अध्याय (84) में शनि पूजा की अलग विधि दी है।

शनि स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

शनिवार को, विशेषकर साढ़े साती, ढैया या शनि की दशा में।

पराशर के अनुसार शनि शांति कैसे करें?

लोहे की प्रतिमा, 23,000 जप, शमी की समिधा से हवन और काली गाय की दक्षिणा (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 84.4–25)।