दशा व गणित

दशमांश कुंडली (D10) — गणना का सूत्र, दस दिक्पाल और करियर का विचार

लेखक: एस्ट्रो रामजी (Astro Raamji) · · 3 मिनट पढ़ें

दशमांश कुंडली (D10)

संक्षेप में

दशमांश (D10) में हर राशि के 30° को 3° के दस भागों में बाँटा जाता है। बृहत्पाराशर होराशास्त्र (6.13) के अनुसार विषम राशि में गिनती उसी राशि से और सम राशि में उससे नौवीं राशि से शुरू होती है। पराशर (7.3) कहते हैं कि दशमांश से "महत्फल" — यानी कर्म, पद और प्रतिष्ठा — का विचार करें। दशमेश बलवान, उच्च या स्वराशि में हो तो जातक यशस्वी और शुभ कर्म करने वाला होता है (21.2)।

दशमांश क्या है?

दशमांश यानी राशि का दसवाँ भाग। पराशर के सोलह वर्गों में यह कर्म, आजीविका और पद-प्रतिष्ठा का वर्ग है:

नवमांशे कलत्राणां दशमांशे महत्फलम् ।
द्वादशांशे तथा पित्रोश्चिन्तनं षोडशांशके ॥ ३॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 7 (वर्गविवेकाध्यायः) · श्लोक 3

अर्थ: नवांश से जीवनसाथी का और दशमांश से "महत्फल" — जीवन के बड़े कर्म और उपलब्धियों — का विचार करें।

गणना का सूत्र

दशमांशाः स्वतश्चौजे युग्मे तन्नवमात् स्मृताः ।
दश पूर्वादिदिक्पाला इन्द्राऽग्नियमराक्षसाः ॥ १३॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 6 (षोडशवर्गाध्यायः) · श्लोक 13
वरुणो मारुतश्चैव कुबेरेशानपद्मजाः ।
अनन्तश्च क्रमादोजे समे वा व्युत्क्रमेण तु ॥ १४॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 6 (षोडशवर्गाध्यायः) · श्लोक 14

अर्थ: विषम राशि में दशमांश उसी राशि से गिने जाते हैं और सम राशि में उससे नौवीं राशि से। दस दशमांशों के देवता दस दिक्पाल हैं — इंद्र, अग्नि, यम, राक्षस (निर्ऋति), वरुण, मरुत (वायु), कुबेर, ईशान, ब्रह्मा और अनंत। विषम राशि में यह क्रम सीधा और सम राशि में उलटा चलता है।

  • हर दशमांश = 30° ÷ 10 = 3°।
  • विषम राशियाँ (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ): पहला दशमांश उसी राशि का।
  • सम राशियाँ (वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन): पहला दशमांश उससे नौवीं राशि का।

उदाहरण

मान लीजिए सूर्य सिंह 17° पर है।

  • सिंह विषम राशि है, इसलिए गिनती सिंह से ही शुरू होगी।
  • 17° ÷ 3° = 5.67, यानी सूर्य छठे दशमांश (15° से 18°) में है।
  • सिंह (1), कन्या (2), तुला (3), वृश्चिक (4), धनु (5), मकर (6) — दशमांश राशि मकर।
  • विषम राशि का छठा दशमांश — देवता मरुत (वायु)।

जन्म कुंडली में दशम भाव: पराशर के नियम

दशमांश अकेले नहीं, जन्म कुंडली के दशम भाव के साथ पढ़ा जाता है। कर्मभावफलाध्याय (21) में पराशर कहते हैं:

सबले कर्मभावेशे स्वोच्चे स्वांशे स्वराशिगे ।
जातस्तातसुखेनाढ्यो यशस्वी शुभकर्मकृत् ॥ २॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 21 (कर्मभावफलाध्यायः) · श्लोक 2

अर्थ: दशमेश बलवान होकर उच्च, स्वनवांश या स्वराशि में हो, तो जातक पिता का सुख पाता है, यशस्वी होता है और शुभ कर्म करता है।

कर्मेशे शुभसंयुक्ते शुभस्थानगते तथा ।
राजद्वारे च वाणिज्ये सदा लाभोऽन्यथान्यथा ॥ ४॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 21 (कर्मभावफलाध्यायः) · श्लोक 4

अर्थ: दशमेश शुभ ग्रहों से युक्त होकर शुभ भाव में हो, तो राज-दरबार (सरकारी क्षेत्र) और व्यापार में सदा लाभ होता है; अन्यथा उलटा।

तुङ्गराशिं समाश्रित्य कर्मेशे गुरुसंयुते ।
भाग्येशे कर्मराशिस्थे मानैश्वर्यप्रतापवान् ॥ ८॥
बृहत्पाराशर होराशास्त्र · अध्याय 21 (कर्मभावफलाध्यायः) · श्लोक 8

अर्थ: दशमेश उच्च राशि में गुरु के साथ हो और भाग्येश दशम भाव में हो, तो जातक मान, ऐश्वर्य और प्रताप से युक्त होता है।

करियर के लिए क्या देखें?

  • जन्म कुंडली: दशम भाव, दशमेश, और दशम पर दृष्टि डालने वाले ग्रह।
  • दशमांश: D10 का लग्न, उसका स्वामी, और जन्म कुंडली के दशमेश की D10 में स्थिति।
  • कारक: सूर्य (सरकार, अधिकार), शनि (सेवा, परिश्रम), बुध (व्यापार), गुरु (शिक्षा, परामर्श)।
  • दशा: करियर में बड़े बदलाव प्रायः दशमेश या D10 में बलवान ग्रह की दशा में आते हैं।

D10 लग्न हर राशि में 3° का होता है, यानी लग्न के हिसाब से औसतन लगभग 12 मिनट में बदल जाता है। इसलिए सही जन्म समय के बिना D10 पर भरोसा न करें।

हमारी मुफ़्त जन्म पत्रिका में दशमांश सहित सोलहों वर्ग अपने आप बनते हैं। नवांश की गणना हमारे लेख नवांश कुंडली (D9) में देखें।

पूछे जाने वाले प्रश्न

दशमांश कुंडली कैसे बनती है?

हर राशि को 3° के दस भागों में बाँटते हैं। विषम राशि में गिनती उसी राशि से और सम राशि में उससे नौवीं राशि से शुरू होती है (बृहत्पाराशर होराशास्त्र 6.13)।

दशमांश से क्या देखा जाता है?

पराशर (7.3) के अनुसार "महत्फल" — कर्म, करियर, पद और प्रतिष्ठा।

दशमांश के दस देवता कौन हैं?

इंद्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, मरुत, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा और अनंत — विषम राशि में सीधे क्रम में और सम राशि में उलटे क्रम में (6.13–14)।

सरकारी नौकरी का योग कैसे देखें?

पराशर (21.4) कहते हैं कि दशमेश शुभ ग्रहों से युक्त होकर शुभ भाव में हो तो राज-दरबार और व्यापार में लाभ होता है। साथ में सूर्य का बल और D10 देखें।