दरिद्र योग — पराशर के दारिद्र्ययोगाध्याय के योग और उनके परिहार
संक्षेप में
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (अध्याय 42) के अनुसार दरिद्र योग मुख्यतः तब बनता है जब लग्नेश 6, 8 या 12वें भाव में हो, या त्रिक भावों के स्वामी लग्न में हों, और उन पर मारकेश (दूसरे-सातवें के स्वामी) का प्रभाव हो। शुभ भावों में पाप ग्रह और पाप भावों में शुभ ग्रह होना भी धनहीनता देता है। पराशर स्वयं बताते हैं कि दूसरे भाव में मंगल-शनि पर बुध की दृष्टि हो तो यही योग महाधन देता है।
दरिद्र योग का अर्थ
पराशर ने धन देने वाले योगों के बाद एक पूरा अध्याय (42, दारिद्र्ययोगाध्याय) उन योगों पर दिया है जिनसे जीवन में धन की कमी रहती है। इस अध्याय की खास बात यह है कि अंत में पराशर स्वयं कुछ योगों का भंग भी बताते हैं।
मुख्य दरिद्र योग
लग्नेशे च व्ययस्थाने व्ययेशे लग्नमागते ।
मारकेशयुते दृष्टे निर्धनो जायते नरः ॥ २॥अर्थ: लग्नेश बारहवें भाव में और बारहवें का स्वामी लग्न में हो, और उन पर मारकेश की युति या दृष्टि हो, तो जातक निर्धन होता है।
लग्नेशे षष्ठभावस्थे षष्ठेशे लग्नमागते ।
मारकेशेन युग्दृष्टे धनहीनः प्रजायते ॥ ३॥अर्थ: लग्नेश छठे भाव में और छठे का स्वामी लग्न में हो, और मारकेश से युति या दृष्टि हो, तो धनहीनता।
षष्ठाष्टमव्ययगते लग्नपे पापसंयुते ।
धनेशे रिपुभे नीचे राजवंश्योऽपि निर्धनः ॥ ५॥अर्थ: लग्नेश 6, 8 या 12वें भाव में पाप ग्रह के साथ हो, और धनेश (दूसरे भाव का स्वामी) शत्रु राशि में या नीच हो, तो राजवंश में जन्मा व्यक्ति भी निर्धन हो जाता है।
शुभ-पाप ग्रहों की उलटी स्थिति
शुभस्थानगताः पापाः पापस्थानगताः शुभाः ।
निर्धनो जायते बालो भोजनेन प्रपीडितः ॥ १२॥अर्थ: पाप ग्रह शुभ भावों (केंद्र-त्रिकोण) में और शुभ ग्रह पाप भावों (6, 8, 12) में हों, तो जातक निर्धन होता है और भोजन तक के लिए कष्ट पाता है।
दशा में धनहानि
कोणेशदृष्टिहीना ये त्रिकेशैः संयुता ग्रहाः ।
ते सर्वे स्वदशाकाले धनहानिकराः स्मृताः ॥ १३॥अर्थ: जो ग्रह त्रिक भावों के स्वामियों से युक्त हों और जिन पर त्रिकोण के स्वामियों की दृष्टि न हो, वे अपनी दशा में धनहानि करते हैं।
यह श्लोक बहुत व्यावहारिक है — दरिद्र योग हमेशा पूरे जीवन नहीं चलता, बल्कि प्रायः उन ग्रहों की दशा में अनुभव होता है।
मारकेश कौन हैं?
इन योगों में बार-बार "मारकेश" शब्द आता है। लग्न से दूसरे और सातवें भाव के स्वामी मारकेश कहलाते हैं। दूसरा भाव धन का भी है, इसलिए धन के योगों में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
पराशर का बताया भंग
अध्याय के अंत में पराशर कहते हैं कि अब भंग-सहित दरिद्र योग बताता हूँ:
अथ दारिद्र्ययोगांस्त् कथयामि सभङ्गकान् ।
धनसंस्थौ तु भौमार्की कथितौ धननाशकौ ॥ १६॥बुधेक्षितौ महावित्तं कुरुतो नात्र संशयः ।
निःस्वतां कुरुते तत्र रविर्नित्यं यमेक्षितः ॥ १७॥अर्थ: दूसरे भाव में मंगल और शनि धन का नाश करने वाले बताए गए हैं, पर यदि उन पर बुध की दृष्टि हो तो वे निःसंदेह महाधन देते हैं। दूसरे भाव में सूर्य पर शनि की दृष्टि हो तो निर्धनता देता है।
महाधनयुतं ख्यातं शन्यदृष्टः करोत्यसौ ।
शनिश्चापि रवेर्दृष्ट्या फलमेवं प्रयच्छति ॥ १८॥अर्थ: वही सूर्य शनि से दृष्ट न हो तो महाधन और ख्याति देता है, और शनि के लिए भी सूर्य की दृष्टि के संबंध में ऐसा ही फल कहा गया है।
इससे साफ़ है कि एक ही ग्रह-स्थिति किसी दृष्टि से उलट सकती है। इसलिए केवल एक योग देखकर "दरिद्र योग है" कह देना ठीक नहीं।
अपनी कुंडली में क्या देखें?
- लग्नेश किस भाव में है और कितना बलवान है।
- दूसरे भाव और धनेश की स्थिति — स्वराशि, उच्च, मित्र या नीच-शत्रु राशि।
- ग्यारहवाँ भाव (लाभ) और नवम भाव (भाग्य) का बल।
- त्रिकोण के स्वामियों की दृष्टि — ये पराशर के अनुसार धनहानि से बचाती हैं।
- वर्तमान और आने वाली दशाएँ।
पराशर ने इस अध्याय में अलग से उपाय नहीं बताए हैं। जो ग्रह पीड़ा दे रहा हो, उसके लिए ग्रहशांति अध्याय (84) के अनुसार जप-दान करना शास्त्र-सम्मत रास्ता है। अपनी कुंडली मुफ़्त जन्म पत्रिका में देखें।
पूछे जाने वाले प्रश्न
दरिद्र योग कैसे बनता है?
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (अध्याय 42) के अनुसार मुख्यतः जब लग्नेश 6, 8 या 12वें भाव में हो या इन भावों के स्वामी लग्न में हों, और उन पर मारकेश का प्रभाव हो।
क्या दरिद्र योग का भंग होता है?
हाँ। पराशर (42.16–18) कहते हैं कि दूसरे भाव में मंगल-शनि पर बुध की दृष्टि हो तो वे महाधन देते हैं, और दूसरे भाव का सूर्य शनि से दृष्ट न हो तो धन और ख्याति देता है।
क्या दरिद्र योग पूरे जीवन रहता है?
नहीं। पराशर (42.13) के अनुसार त्रिक भावेशों से जुड़े ग्रह अपनी दशा में धनहानि करते हैं, इसलिए इसका प्रभाव मुख्यतः उन्हीं दशाओं में दिखता है।
मारकेश किसे कहते हैं?
लग्न से दूसरे और सातवें भाव के स्वामी को मारकेश कहते हैं।